राजस्थान की 200 साल पुरानी जोधपुरी मोजड़ी को मिला GI टैग, पारंपरिक हस्तशिल्प को मिली वैश्विक पहचान
राजस्थान की 200 साल पुरानी जोधपुरी मोजड़ी को मिला GI टैग
राजस्थान की पारंपरिक जोधपुरी मोजड़ी को GI टैग मिला। इससे स्थानीय कारीगरों, हस्तशिल्प उद्योग और निर्यात को नई पहचान व बढ़ावा मिलेगा।
राजस्थान की प्रसिद्ध पारंपरिक जोधपुरी मोजड़ी (Jodhpuri Mojari) को भौगोलिक संकेतक (Geographical Indication-GI) टैग प्रदान किया गया है। लगभग 200 वर्षों से अपनी उत्कृष्ट कारीगरी, आकर्षक डिजाइन और सांस्कृतिक विरासत के लिए प्रसिद्ध यह पारंपरिक फुटवियर अब राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विशिष्ट पहचान के साथ संरक्षित होगा। GI टैग मिलने से न केवल राजस्थान के हस्तशिल्प को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि हजारों स्थानीय कारीगरों की आजीविका और निर्यात संभावनाओं को भी नई मजबूती मिलेगी।
क्या है जोधपुरी मोजड़ी?
जोधपुरी मोजड़ी राजस्थान की पारंपरिक हस्तनिर्मित चमड़े की जूती है, जिसे विशेष रूप से जोधपुर और आसपास के क्षेत्रों के कारीगर हाथों से तैयार करते हैं। इसकी पहचान रंग-बिरंगी कढ़ाई, बारीक नक्काशी, पारंपरिक डिजाइनों और टिकाऊ निर्माण के लिए होती है।
इस मोजड़ी को पुरुषों और महिलाओं दोनों द्वारा पारंपरिक परिधानों के साथ पहना जाता है। आज यह फैशन उद्योग में भी अपनी अलग पहचान बना चुकी है।
GI टैग मिलने से क्या होगा लाभ?
GI टैग मिलने के बाद—
- जोधपुरी मोजड़ी की विशिष्ट पहचान को कानूनी संरक्षण मिलेगा।
- नकली उत्पादों पर रोक लगाने में मदद मिलेगी।
- स्थानीय कारीगरों की आय बढ़ने की संभावना होगी।
- निर्यात और अंतरराष्ट्रीय बाजार में मांग बढ़ेगी।
- पारंपरिक हस्तशिल्प और सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण होगा।
- ‘वोकल फॉर लोकल’ और ‘मेक इन इंडिया’ अभियान को भी मजबूती मिलेगी।
200 वर्षों से जीवित है यह परंपरा
इतिहासकारों के अनुसार जोधपुरी मोजड़ी का इतिहास लगभग दो शताब्दियों पुराना है। पहले इसे राजघरानों और शाही परिवारों द्वारा विशेष अवसरों पर पहना जाता था। समय के साथ यह आम लोगों के बीच भी लोकप्रिय हो गई और आज राजस्थान की सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है।
कारीगरों के लिए बड़ी उपलब्धि
जोधपुर और आसपास के क्षेत्रों में हजारों परिवार पीढ़ियों से मोजड़ी निर्माण से जुड़े हुए हैं। GI टैग मिलने के बाद इन कारीगरों को अपने उत्पादों के बेहतर दाम मिलने, नए बाजारों तक पहुंच बनाने और पारंपरिक कला को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में मदद मिलेगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था और हस्तशिल्प उद्योग दोनों को लाभ होगा।
भारत में बढ़ रही GI उत्पादों की संख्या
भारत में कृषि उत्पादों, खाद्य पदार्थों, हस्तशिल्प और पारंपरिक वस्तुओं को लगातार GI टैग दिए जा रहे हैं। इसका उद्देश्य क्षेत्रीय उत्पादों की मौलिकता बनाए रखना और उन्हें वैश्विक बाजार में विशिष्ट पहचान दिलाना है।
राजस्थान पहले से ही ब्लू पॉटरी, कोटा डोरिया, बगरू प्रिंट और सांगानेरी प्रिंट जैसे कई GI उत्पादों के लिए प्रसिद्ध है। अब जोधपुरी मोजड़ी का नाम भी इस प्रतिष्ठित सूची में शामिल हो गया है।
पर्यटन को भी मिलेगा बढ़ावा
पर्यटन विशेषज्ञों का मानना है कि GI टैग मिलने के बाद देश-विदेश के पर्यटक जोधपुरी मोजड़ी में और अधिक रुचि दिखाएंगे। इससे राजस्थान के हस्तशिल्प बाजार, स्थानीय पर्यटन और पारंपरिक उद्योगों को भी लाभ मिलेगा।
निष्कर्ष
जोधपुरी मोजड़ी को मिला GI टैग केवल एक उत्पाद की पहचान नहीं, बल्कि राजस्थान की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, पारंपरिक कारीगरी और स्थानीय शिल्पकारों के वर्षों के समर्पण का सम्मान है। यह उपलब्धि भारतीय हस्तशिल्प को वैश्विक स्तर पर नई पहचान दिलाने के साथ-साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूती प्रदान करेगी।





