CBD COP 17:-आर्मेनिया के येरेवन में जैव विविधता सम्मेलन शुरू, 2030 तक प्रकृति संरक्षण के लक्ष्यों पर होगी चर्चा ???

जैव विविधता के संरक्षण को लेकर संयुक्त राष्ट्र का 17वां सम्मेलन 19 अक्टूबर 2026 को आर्मेनिया की राजधानी येरेवन में शुरू हुआ...

CBD COP 17: जैव विविधता के संरक्षण को लेकर संयुक्त राष्ट्र का 17वां सम्मेलन 19 अक्टूबर 2026 को आर्मेनिया की राजधानी येरेवन में शुरू हुआ। यह बैठक 30 अक्टूबर तक चलेगी। इसमें दुनिया भर के देश वर्ष 2030 तक जैव विविधता की रक्षा के लिए तय किए गए लक्ष्यों की प्रगति की समीक्षा करेंगे।

जैव विविधता संरक्षण के लिए वैश्विक प्रयासों पर नजर

जैव विविधता यानी Biodiversity का अर्थ पृथ्वी पर मौजूद पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों, सूक्ष्म जीवों और उनके प्राकृतिक आवासों की विविधता से है। पृथ्वी पर जीवन का संतुलन बनाए रखने में जैव विविधता की अहम भूमिका है। जंगल, नदियां, समुद्र, आर्द्रभूमि और दूसरे प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र मानव जीवन, खाद्य सुरक्षा, स्वच्छ पानी और अर्थव्यवस्था से सीधे जुड़े हुए हैं।

येरेवन में आयोजित CBD COP 17 का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य यह आकलन करना है कि वर्ष 2022 में तय किए गए वैश्विक जैव विविधता लक्ष्यों पर दुनिया ने कितनी प्रगति की है और वर्ष 2030 तक निर्धारित उद्देश्यों को पूरा करने के लिए किन कदमों की जरूरत है।

क्या है कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता फ्रेमवर्क?

दिसंबर 2022 में कनाडा के मॉन्ट्रियल में आयोजित जैव विविधता सम्मेलन के दौरान कुनमिंग-मॉन्ट्रियल ग्लोबल बायोडायवर्सिटी फ्रेमवर्क अपनाया गया था। इसके तहत वर्ष 2030 तक प्रकृति के संरक्षण और जैव विविधता के नुकसान को रोकने के लिए 23 लक्ष्य निर्धारित किए गए।

इस फ्रेमवर्क का प्रमुख लक्ष्य वर्ष 2030 तक पृथ्वी की कम से कम 30 प्रतिशत स्थलीय और समुद्री भूमि को संरक्षण के दायरे में लाना है। इसके साथ ही क्षतिग्रस्त पारिस्थितिकी तंत्र को बहाल करना, प्रदूषण कम करना, प्राकृतिक संसाधनों का टिकाऊ उपयोग बढ़ाना और जैव विविधता को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियों पर अंकुश लगाना भी इसमें शामिल है।

2030 के लक्ष्य हासिल करना बड़ी चुनौती

सम्मेलन से पहले जारी संयुक्त राष्ट्र की पहली वैश्विक आकलन रिपोर्ट ने जैव विविधता संरक्षण को लेकर चिंता बढ़ाई है। रिपोर्ट के अनुसार, कई देशों ने राष्ट्रीय स्तर पर लक्ष्य और कार्ययोजनाएं तैयार की हैं, लेकिन अब तक की प्रगति वैश्विक महत्वाकांक्षा के अनुरूप नहीं है। आकलन किए गए राष्ट्रीय लक्ष्यों में आधे से भी कम को सही दिशा में आगे बढ़ता पाया गया।

ऐसे में COP 17 में देशों के सामने यह चुनौती है कि वे केवल घोषणाओं तक सीमित न रहें, बल्कि संरक्षण योजनाओं को जमीन पर लागू करने के लिए स्पष्ट समयसीमा, पर्याप्त संसाधन और जवाबदेही तय करें।

जैव विविधता संरक्षण के लिए फंडिंग पर जोर

इस सम्मेलन में वित्तीय संसाधन जुटाना भी एक प्रमुख मुद्दा है। वर्ष 2030 तक जैव विविधता संरक्षण के लिए सालाना कम से कम 200 अरब अमेरिकी डॉलर जुटाने का वैश्विक लक्ष्य रखा गया है। हालांकि, उपलब्ध आकलनों के अनुसार, वर्तमान वित्तीय सहायता इस लक्ष्य से काफी कम है। इसका असर विशेष रूप से उन विकासशील देशों पर पड़ता है, जहां प्राकृतिक संपदा तो प्रचुर मात्रा में है, लेकिन संरक्षण योजनाओं के लिए संसाधन सीमित हैं।

बैठक में इस बात पर चर्चा महत्वपूर्ण है कि विकसित देश, विकासशील देश, निजी क्षेत्र और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं संरक्षण के लिए किस तरह योगदान देंगी। इसके अलावा प्रकृति को नुकसान पहुंचाने वाली सब्सिडी में सुधार और पर्यावरण-अनुकूल निवेश को प्रोत्साहन देने पर भी ध्यान दिया जा रहा है।

भारत के लिए क्यों अहम है यह सम्मेलन?

भारत जैव विविधता के लिहाज से महत्वपूर्ण देशों में शामिल है। यहां हिमालय, पश्चिमी घाट, जंगल, नदियां, समुद्री तट, आर्द्रभूमियां और अनेक प्रकार के वन्यजीव पाए जाते हैं। इन प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण पर्यावरण संतुलन के साथ-साथ कृषि, जल सुरक्षा, आजीविका और स्थानीय समुदायों के भविष्य के लिए भी जरूरी है।

CBD COP 17 में वैश्विक लक्ष्यों की समीक्षा से भारत सहित सभी सदस्य देशों को अपनी संरक्षण नीतियों, राष्ट्रीय जैव विविधता योजनाओं और वित्तीय जरूरतों पर विचार करने का अवसर मिलेगा। सम्मेलन में होने वाले निर्णयों से यह तय करने में मदद मिल सकती है कि वर्ष 2030 तक प्रकृति संरक्षण की दिशा में कार्रवाई को किस तरह तेज किया जाए।

क्या है CBD COP 17 का महत्व?

CBD COP 17 केवल पर्यावरण से जुड़ी एक अंतरराष्ट्रीय बैठक नहीं है, बल्कि यह दुनिया के लिए अपने जैव विविधता संरक्षण के वादों की समीक्षा करने का महत्वपूर्ण अवसर है। सम्मेलन 19 से 30 अक्टूबर 2026 तक येरेवन में आयोजित हो रहा है। इसके साथ कार्टाजेना प्रोटोकॉल और नागोया प्रोटोकॉल से जुड़ी बैठकें भी हो रही हैं।

आने वाले वर्षों में प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ते दबाव, जलवायु परिवर्तन और प्रजातियों के विलुप्त होने के खतरे से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग बेहद जरूरी होगा। इस सम्मेलन की सफलता इस बात से आंकी जाएगी कि देश कितनी ठोस योजनाओं, वित्तीय प्रतिबद्धताओं और प्रभावी कदमों पर सहमति बना पाते हैं।

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