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ऊपर से हेल्दी दिखने वाले न्यूबॉर्न में भी हो सकती हैं ये छिपी हुई बीमारियां

पेरेंट्स बनना हर किसी का सपना होता है और यह जीवन का सबसे अहम पड़ाव भी होता है। हर माता-पिता यही चाहते हैं कि उनका नवजात शिशु पूरी तरह हेल्दी और तंदुरुस्त हो। आमतौर पर बच्चे हेल्दी ही पैदा होते हैं, लेकिन कई बार कुछ बच्चों में जन्म से ही कुछ विकार (Congenital Disorders) या शारीरिक कमियां होती हैं।

इस बारे में आज भी काफी कम लोग अच्छी तरह से जानते हैं और इसलिए लोगों को इसके बारे में जागरूक करने के लिए जनवरी माह को बर्थ डिफेक्ट अवेयरनेस मंथ के तौर पर बनाया जाता है। जन्म से होने वाली ये समस्याएं दिल की बनावट, अंगों के विकास या शरीर के अन्य कार्यों से जुड़ी हो सकती हैं। इस बारे में विस्तार से बता रही हैं यथार्थ सुपर स्पेशलिटी अस्पताल, सेक्टर 20, फरीदाबाद में नियोनेटोलॉजी के डायरेक्टर डॉ. अनिल बत्रा-

न्यूबॉर्न में बर्थ डिसऑर्डर की पहचान
डॉक्टर बताते हैं कि बच्चों में जन्मजात कमियों या बीमारियों का पता अक्सर पैदा होते ही या उसके कुछ दिनों के अंदर ही चल जाता है। हालांकि, कुछ समस्याएं ऐसी होती हैं, जो बच्चे के थोड़ा बड़ा होने पर सामने आती हैं। अगर इन समस्याओं की पहचान जल्दी हो जाए, तो समय पर इलाज करना आसान होता है। आमतौर पर इसमें दिल की बनावट में कमी, कटे होंठ या तालू और रीढ़ की हड्डी से जुड़ी समस्याएं शामिल हैं।

शारीरिक बनावट से जुड़ी समस्याएं
कटे होंठ और तालू: कई बार बच्चे के ऊपरी होंठ या मुंह के अंदर (तालू) में छेद होता है। यह जन्म के तुरंत बाद दिख जाता है और सर्जरी से पूरी तरह ठीक हो सकता है। ऐसे बच्चों को मां का दूध पीने में परेशानी होती है, इसलिए उन्हें खास बोतल से दूध पिलाया जाता है। अगर बच्चे का जबड़ा छोटा है, तो जीभ पीछे मुड़ने से सांस लेने में दिक्कत हो सकती है, इसलिए इसकी जांच जरूरी है।

पैरों और पेट की समस्याएं: कुछ बच्चों के पैर अंदर की तरफ मुड़े होते हैं, जिसे ‘क्लबफुट’ कहते हैं। वहीं, कुछ गंभीर मामलों में पेट की दीवार ठीक से नहीं बन होती है और आंतें शरीर के बाहर दिखाई देती हैं। ऐसी स्थिति में तुरंत ऑपरेशन की जरूरत होती है।

रीढ़ और मलद्वार की समस्याएं: ‘स्पाइना बिफिडा’ जैसी स्थिति में बच्चे की पीठ पर रीढ़ की हड्डी खुली रह जाती है या वहां एक थैली जैसी दिखती है। इसके अलावा, अगर बच्चे का मलद्वार (Anus) नहीं बना है या गलत जगह पर है, तो उसे सर्जरी से ठीक किया जाता है।

दिल से जुड़ी समस्याएं
डॉक्टर मुताबिक जन्म से होने वाली दिल से जुड़ी बीमारियों के लक्षण कई बार तुरंत नहीं दिखते। डॉक्टर को सिर्फ धड़कन में कुछ अलग आवाज सुनाई दे सकती है। लेकिन अगर बच्चा नीला पड़ रहा हो (साइनोसिस), बहुत तेज सांस ले रहा हो या दूध ठीक से नहीं पी रहा हो, तो यह दिल की बीमारी का संकेत हो सकता है। आर्टरीज से जुड़ी गंभीर समस्याओं का पता अक्सर सांस की तकलीफ और ऑक्सीजन लेवल कम होने के कारण जन्म के कुछ घंटों में ही चल जाता है।

जरूरी जांच और टेस्ट
पल्स ऑक्सीमेट्री (Pulse Oximetry):
डॉक्टर ने बताया कि बच्चे में दिल की गंभीर समस्याओं को पकड़ने के लिए यह टेस्ट बहुत कारगर है। इसमें बच्चे के हाथ और पैर पर एक छोटा सेंसर लगाकर खून में ऑक्सीजन की मात्रा नापी जाती है। इस टेस्ट को जन्म के 24 घंटे बाद करना सबसे अच्छा होता है। अगर इसमें कोई गड़बड़ी मिलती है, तो तुरंत ‘इकोकार्डियोग्राम’ किया जाता है, ताकि किसी भी खतरे से बचा जा सके।

शारीरिक और अन्य जांच: डिलीवरी के तुरंत बाद डॉक्टर बच्चे की सिर से पैर तक पूरी जांच करते हैं। इसमें त्वचा का रंग, सांस की गति और अंगों की बनावट देखी जाती है।

ब्लड और अन्य टेस्ट: बच्चे की एड़ी से थोड़ा-सा खून लेकर मेटाबॉलिज्म से जुड़ी बीमारियों की जांच की जाती है। इसके अलावा, आंखों की जांच (मोतियाबिंद के लिए) और कानों की मशीन से जांच (सुनने की क्षमता के लिए) भी की जाती है।

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