दक्षिण चीन सागर विवाद: अमेरिका, ब्रिटेन समेत 14 देशों ने चीन के दावों को किया खारिज, समुद्री कानून का किया समर्थन

दक्षिण चीन सागर पर चीन को बड़ा झटका, अमेरिका-यूके समेत 14 देशों ने दावों को किया खारिज

अमेरिका, ब्रिटेन सहित 14 देशों ने दक्षिण चीन सागर में चीन के दावों को खारिज करते हुए UNCLOS और 2016 के अंतरराष्ट्रीय फैसले का समर्थन किया।

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14 देशों का संयुक्त बयान, चीन के दावों पर सवाल

दक्षिण चीन सागर (South China Sea) को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चीन को बड़ा कूटनीतिक झटका लगा है। अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, जापान, कनाडा सहित 14 देशों ने एक संयुक्त बयान जारी कर दक्षिण चीन सागर में चीन के व्यापक समुद्री दावों को अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप नहीं माना। इन देशों ने स्पष्ट कहा कि समुद्री क्षेत्रों पर दावे संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून संधि (UNCLOS) के अनुसार ही तय होने चाहिए और किसी भी देश द्वारा एकतरफा दावे स्वीकार्य नहीं हैं।

2016 के अंतरराष्ट्रीय फैसले का किया समर्थन

संयुक्त बयान में 2016 में हेग स्थित स्थायी मध्यस्थता न्यायाधिकरण (Permanent Court of Arbitration) के उस ऐतिहासिक फैसले का भी समर्थन किया गया, जिसमें चीन की तथाकथित ‘नाइन-डैश लाइन (Nine-Dash Line)’ को कानूनी आधारहीन बताया गया था। चीन ने उस फैसले को स्वीकार नहीं किया था, लेकिन कई देश इसे अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून के लिए महत्वपूर्ण मानते हैं।

क्यों अहम है दक्षिण चीन सागर?

दक्षिण चीन सागर दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक मार्गों में से एक है। हर वर्ष यहां से खरबों डॉलर का वैश्विक व्यापार गुजरता है। यह क्षेत्र तेल, प्राकृतिक गैस और समुद्री संसाधनों से भी समृद्ध माना जाता है। इसी कारण चीन, फिलीपींस, वियतनाम, मलेशिया, ब्रुनेई और ताइवान सहित कई देशों के बीच यहां समुद्री दावों को लेकर लंबे समय से विवाद जारी है।

चीन के बढ़ते सैन्यीकरण पर चिंता

संयुक्त बयान में चीन द्वारा कृत्रिम द्वीपों के निर्माण, सैन्य ढांचे के विस्तार और क्षेत्र में बढ़ती सैन्य गतिविधियों पर भी चिंता व्यक्त की गई। हस्ताक्षरकर्ता देशों ने समुद्री मार्गों की स्वतंत्रता (Freedom of Navigation), क्षेत्रीय शांति और नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था बनाए रखने पर जोर दिया।

इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बढ़ेगा रणनीतिक महत्व

विशेषज्ञों का मानना है कि यह संयुक्त रुख इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। इससे क्षेत्रीय सुरक्षा सहयोग और अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून के पालन पर वैश्विक सहमति को भी मजबूती मिलेगी।

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