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‘बेल ऑर्डर में गलती के लिए जज को नौकरी से नहीं हटा सकते’, सुप्रीम कोर्ट का अहम आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश के एक जज की बर्खास्तगी को रद कर दिया। कोर्ट ने साफ कहा कि जमानत देने में सिर्फ कानूनी प्रावधान का जिक्र न करना या कुछ आदेश गलत होना अपने आप में इतनी बड़ी गलती नहीं है कि जज को सेवा से हटा दिया जाए। इसके लिए भ्रष्टाचार, पक्षपात या गलत मंशा का ठोस सबूत जरूरी है।

यह फैसला निर्भय सिंह सुलिया के मामले में आया है जो सालों से अपनी नौकरी वापस पाने की लड़ाई लड़ रहे थे। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने कहा कि सिर्फ न्यायिक आदेशों के आधार पर अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं की जा सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने जोर देकर कहा कि एक निडर जज स्वतंत्र न्यायपालिका की नींव है। न्यायिक अधिकारी का काम बहुत मुश्किल होता है। हर मामले में एक पक्ष हारता है और नाराज होकर शिकायत कर सकता है। कोर्ट ने चेतावनी दी कि कुछ नाराज लोग या वकील झूठी शिकायतें करके जजों पर दबाव डालने की कोशिश करते हैं।

कोर्ट ने यह भी बताया कि निचली अदालतों के जजों पर बहुत काम का बोझ होता है। एक दिन में दर्जनों मामले सुनने पड़ते हैं। ज्यादातर जज ईमानदारी से अपना काम करते हैं, लेकिन गलतियां हो सकती हैं। ऐसी गलतियों पर सीधे बर्खास्तगी जैसी सजा नहीं दी जा सकती है।

क्या है पूरा मामला?
निर्भय सिंह सुलिया 1987 में मध्य प्रदेश न्यायिक सेवा में शामिल हुए थे। 2003 में उन्हें अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश बनाया गया। 2011-12 में खरगोन में पोस्टिंग के दौरान एक शिकायत आई कि वे मध्य प्रदेश आबकारी अधिनियम के मामलों में जमानत देने में भ्रष्टाचार कर रहे हैं।

शिकायत थी कि कुछ मामलों में जहां 50 बल्क लीटर से ज्यादा शराब जब्त हुई थी, उन्होंने जमानत दे दी, जबकि दूसरे समान मामलों में मना कर दिया। जांच हुई और चार जमानत आदेशों को आधार बनाकर उन पर दोहरा मापदंड अपनाने और भ्रष्टाचार का आरोप लगा था। जांच अधिकारी ने एक आरोप साबित माना और हाईकोर्ट की सिफारिश पर 2014 में उन्हें सेवा से हटा दिया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने क्यों दी राहत
कोर्ट ने पाया कि इन जमानत आदेशों में सिर्फ एक कानूनी धारा (59-A) का जिक्र नहीं किया गया था, लेकिन इससे भ्रष्टाचार साबित नहीं होता। कोई सबूत नहीं था कि जमानत देने के पीछे कोई बाहरी दबाव या पैसा लिया गया। कोर्ट ने कहा कि यह ज्यादा से ज्यादा न्यायिक गलती हो सकती है, लेकिन दुराचार नहीं हो सकता है।

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