कर्नाटक कैबिनेट का बड़ा फैसला, तुलु को मिली दूसरी अतिरिक्त प्रशासनिक भाषा की मंजूरी; दक्षिण कन्नड़ और उडुपी में होगा इस्तेमाल???

कर्नाटक में तुलु को मिली दूसरी अतिरिक्त प्रशासनिक भाषा की मंजूरी, जानें कहां होगा इस्तेमाल....

बेंगलुरु/मंगलुरु: कर्नाटक सरकार ने तुलु भाषा को लेकर लंबे समय से चली आ रही मांग पर बड़ा फैसला लिया है। मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार की अध्यक्षता में 18 सितंबर 2026 को मंगलुरु में हुई कैबिनेट बैठक में तुलु को राज्य की दूसरी अतिरिक्त प्रशासनिक भाषा के रूप में मान्यता देने को मंजूरी दी गई। हालांकि, इसका आधिकारिक प्रशासनिक इस्तेमाल दक्षिण कन्नड़ और उडुपी जिलों तक सीमित रहेगा।

यह कर्नाटक सरकार की पहली कैबिनेट बैठक थी जो बेंगलुरु के बाहर आयोजित हुई। बैठक में तटीय कर्नाटक से जुड़े कई विकास प्रस्तावों के साथ तुलु भाषा को प्रशासनिक मान्यता देने का निर्णय लिया गया।

तुलु को क्यों मिली यह मान्यता?

तुलु को आधिकारिक प्रशासनिक भाषा का दर्जा देने की मांग तटीय कर्नाटक में लंबे समय से उठती रही है। तुलु मुख्य रूप से दक्षिण कन्नड़ और उडुपी जिलों में बोली जाती है। इसके अलावा पड़ोसी केरल के कासरगोड क्षेत्र में भी तुलु भाषी आबादी मौजूद है।

तुलु संगठनों, साहित्यकारों और स्थानीय प्रतिनिधियों की ओर से लंबे समय से मांग की जा रही थी कि प्रशासनिक कामकाज में भी इस भाषा को मान्यता मिले। सरकार के मुताबिक इस मांग पर विशेषज्ञों और अधिकारियों की रिपोर्टों पर भी विचार किया गया।

दक्षिण कन्नड़ और उडुपी में लागू होगा फैसला

मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने कैबिनेट बैठक के बाद स्पष्ट किया कि तुलु को अतिरिक्त प्रशासनिक भाषा का दर्जा दिया जाएगा और इसका प्रशासनिक उपयोग दक्षिण कन्नड़ तथा उडुपी जिलों में होगा। दोनों जिलों के प्रशासन को इसके कार्यान्वयन की जिम्मेदारी दी जाएगी।

इसका मतलब यह नहीं है कि कन्नड़ को हटाकर तुलु को पूरे राज्य की प्रमुख प्रशासनिक भाषा बनाया गया है। बल्कि तुलु को संबंधित तटीय जिलों में अतिरिक्त प्रशासनिक उपयोग के लिए मान्यता दी गई है।

तुलु भाषा का ऐतिहासिक महत्व

तुलु को द्रविड़ भाषा परिवार की प्रमुख भाषाओं में गिना जाता है। इसका अपना समृद्ध लोक साहित्य, मौखिक परंपरा और सांस्कृतिक विरासत है। तटीय कर्नाटक के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में तुलु की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

2011 की जनगणना के अनुसार करीब 18.5 लाख लोगों ने तुलु को अपनी मातृभाषा बताया था। तुलु भाषी क्षेत्र को आम तौर पर तुलुनाडु के नाम से भी जाना जाता है।

82 लाख रुपये सालाना का प्रावधान

तुलु को प्रशासनिक इस्तेमाल में लाने के लिए कर्नाटक सरकार ने हर साल 82 लाख रुपये खर्च करने का प्रावधान किया है। इस राशि का इस्तेमाल अनुवाद, प्रशिक्षण और भाषा के प्रशासनिक उपयोग से जुड़ी अन्य गतिविधियों के लिए किया जाएगा।

इस व्यवस्था के तहत स्थानीय प्रशासन में तुलु भाषा के उपयोग के लिए आवश्यक संसाधन और प्रशिक्षण विकसित किए जाने की योजना है।

आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग भी जारी

तुलु भाषा को प्रशासनिक मान्यता मिलने के बाद अब इसे भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग को भी नई गति मिलने की उम्मीद है।

वर्तमान में संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 भाषाएं शामिल हैं। तुलु संगठनों की लंबे समय से मांग रही है कि तुलु को भी इस सूची में शामिल किया जाए। हालांकि, कर्नाटक कैबिनेट का मौजूदा फैसला अपने आप में तुलु को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं करता।

पहले भी बनी थी विशेषज्ञ समिति

तुलु को आधिकारिक भाषा का दर्जा देने के मुद्दे पर इससे पहले भी कर्नाटक में अध्ययन किया गया था। 2023 के विधानसभा चुनावों से पहले तत्कालीन भाजपा सरकार ने तुलु को दूसरी आधिकारिक भाषा बनाने के प्रस्ताव का अध्ययन करने के लिए एक समिति गठित की थी।

इस समिति की अध्यक्षता शिक्षाविद् डॉ. मोहन आल्वा ने की थी। समिति से भाषा को आधिकारिक मान्यता देने के संभावित प्रभावों का अध्ययन करने को कहा गया था।

मंगलुरु में पहली बार हुई कैबिनेट बैठक

तुलु को मान्यता देने का फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह घोषणा मंगलुरु में हुई पहली कैबिनेट बैठक के बाद की गई। मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार की अध्यक्षता में हुई बैठक में तटीय क्षेत्र के विकास से जुड़े कई प्रस्तावों पर भी निर्णय लिया गया।

कैबिनेट ने लगभग 32,611 करोड़ रुपये के विभिन्न प्रोजेक्ट और प्रस्तावों को मंजूरी दी। इनमें ग्रामीण विकास, तटीय क्षेत्र, पर्यटन और अन्य बुनियादी ढांचे से जुड़े प्रस्ताव शामिल थे।

पुत्तूर में मेडिकल कॉलेज को भी मंजूरी

कैबिनेट ने दक्षिण कन्नड़ के पुत्तूर तालुक में सरकारी मेडिकल कॉलेज और शिक्षण अस्पताल से जुड़े प्रोजेक्ट को भी मंजूरी दी। इस परियोजना की अनुमानित लागत करीब 549.79 करोड़ रुपये बताई गई है।

सरकार के अनुसार इससे क्षेत्र में चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की क्षमता बढ़ाने में मदद मिलेगी।

दक्षिण कन्नड़ का नाम बदलने पर भी चर्चा

कैबिनेट बैठक में दक्षिण कन्नड़ जिले का नाम बदलकर मंगलुरु जिला करने के प्रस्ताव पर भी चर्चा हुई। मुख्यमंत्री ने कहा कि इस संबंध में ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी किया जाएगा और लोगों से एक महीने तक आपत्तियां तथा सुझाव मांगे जाएंगे।

इसलिए जिले का नाम बदलने का फैसला अभी अंतिम रूप से लागू नहीं हुआ है।

तुलु के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?

तुलु को अतिरिक्त प्रशासनिक भाषा की मान्यता मिलने से दक्षिण कन्नड़ और उडुपी जैसे तुलु भाषी क्षेत्रों में प्रशासन और स्थानीय भाषा के बीच संपर्क बढ़ सकता है। अनुवाद और प्रशिक्षण के लिए बजट उपलब्ध होने से सरकारी कामकाज में तुलु के इस्तेमाल के लिए संस्थागत व्यवस्था भी विकसित की जा सकती है।

हालांकि, इसके वास्तविक प्रभाव का आकलन इसके कार्यान्वयन के बाद ही किया जा सकेगा।

निष्कर्ष

कर्नाटक कैबिनेट ने तुलु को दक्षिण कन्नड़ और उडुपी जिलों में दूसरी अतिरिक्त प्रशासनिक भाषा के रूप में मंजूरी देकर लंबे समय से चली आ रही मांग पर बड़ा फैसला लिया है। सरकार इसके लिए हर साल 82 लाख रुपये का प्रावधान करेगी। हालांकि, यह फैसला तुलु को पूरे कर्नाटक की सामान्य दूसरी भाषा नहीं बनाता और न ही इसे संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करता है। इसके बावजूद तटीय कर्नाटक की भाषा और सांस्कृतिक पहचान के लिहाज से यह निर्णय महत्वपूर्ण है।

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