UN Sea Level Rise Declaration: – संयुक्त राष्ट्र महासभा ने समुद्र के बढ़ते जलस्तर पर अपनाई पहली घोषणा, जलवायु संकट से निपटने के लिए वैश्विक सहयोग पर जोर ???
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने समुद्र के बढ़ते जलस्तर से पैदा हो रहे वैश्विक खतरे पर अपनी पहली राजनीतिक घोषणा को अपनाया है...
24 सितंबर 2026 को न्यूयॉर्क में हुई उच्चस्तरीय बैठक के दौरान सदस्य देशों ने समुद्र के बढ़ते जलस्तर से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग, जलवायु अनुकूलन, वित्तीय सहायता और प्रभावित समुदायों के अधिकारों की रक्षा पर जोर दिया।
समुद्र के बढ़ते जलस्तर को लेकर दुनिया के सामने मौजूद गंभीर चुनौतियों के बीच संयुक्त राष्ट्र महासभा (UN General Assembly) ने एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। महासभा ने पहली बार समुद्र के जलस्तर में वृद्धि के मुद्दे पर एक साझा Political Declaration को अपनाया है।
यह घोषणा 24 सितंबर 2026 को न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में समुद्र के बढ़ते जलस्तर से पैदा हो रहे अस्तित्वगत खतरों पर आयोजित उच्चस्तरीय बैठक के दौरान अपनाई गई। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, इस घोषणा का उद्देश्य समुद्र के बढ़ते जलस्तर के खिलाफ वैश्विक प्रतिक्रिया, लचीलापन और अनुकूलन को मजबूत करना है।
पहली बार सभी देशों ने साझा घोषणा पर जताई सहमति
संयुक्त राष्ट्र की बैठक में समुद्र के बढ़ते जलस्तर को केवल पर्यावरणीय समस्या के तौर पर नहीं, बल्कि विकास, अर्थव्यवस्था, मानवाधिकार, मानवीय सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय सहयोग से जुड़ी चुनौती के रूप में देखा गया।
संयुक्त राष्ट्र महासभा के अध्यक्ष के अनुसार, समुद्र का बढ़ता जलस्तर सीमाओं को नहीं पहचानता और इसका प्रभाव छोटे द्वीपीय देशों से लेकर बड़े तटीय शहरों तक पड़ सकता है।
UN के आधिकारिक ट्रांसक्रिप्ट के अनुसार, महासभा द्वारा अपनाई गई घोषणा समुद्र के बढ़ते जलस्तर पर सभी सदस्य देशों द्वारा पहली बार स्वीकार किया गया साझा पाठ है।
समुद्र का जलस्तर कितनी तेजी से बढ़ रहा है?
संयुक्त राष्ट्र के अनुसार वैश्विक औसत समुद्र स्तर में वृद्धि की रफ्तार पिछले दशकों में तेज हुई है।
संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र के अध्यक्ष डॉ. खलीलुर रहमान ने 24 सितंबर की बैठक में बताया कि सैटेलाइट रिकॉर्ड के शुरुआती दशक की तुलना में वैश्विक औसत समुद्र स्तर बढ़ने की वार्षिक दर दोगुने से अधिक हो चुकी है। वर्ष 1993 से 2002 के दौरान यह दर लगभग 2.1 मिलीमीटर प्रति वर्ष थी, जबकि 2015 से 2024 के बीच यह बढ़कर लगभग 4.7 मिलीमीटर प्रति वर्ष हो गई।
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने भी घोषणा का स्वागत करते हुए कहा कि समुद्र का बढ़ता जलस्तर अर्थव्यवस्था, व्यापार, बुनियादी ढांचे और खाद्य प्रणालियों के लिए गंभीर खतरा पैदा कर रहा है।
करीब 90 करोड़ लोग तटीय क्षेत्रों में रहते हैं
समुद्र के बढ़ते जलस्तर का प्रभाव दुनिया की बड़ी आबादी पर पड़ सकता है। संयुक्त राष्ट्र महासभा के अध्यक्ष के भाषण के अनुसार, लगभग 900 मिलियन लोग निचले तटीय क्षेत्रों में रहते हैं और 2050 तक एक अरब से अधिक लोगों के तटीय खतरों की चपेट में आने की संभावना बताई गई है।
ऐसे क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को तटीय बाढ़, समुद्री कटाव, खारे पानी के भूजल में प्रवेश और बुनियादी ढांचे को नुकसान जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।
छोटे द्वीपीय देशों पर सबसे ज्यादा असर
समुद्र के बढ़ते जलस्तर से छोटे द्वीपीय विकासशील देशों यानी Small Island Developing States (SIDS) के सामने विशेष चुनौती है।
इन देशों का बड़ा हिस्सा समुद्र के बेहद करीब और कम ऊंचाई पर स्थित है। समुद्र का जलस्तर बढ़ने से वहां तटीय भूमि, पेयजल स्रोत, कृषि, आवास और पर्यटन प्रभावित हो सकते हैं।
UN के अनुसार, समुद्र का बढ़ता जलस्तर कुछ देशों के लिए उनकी संप्रभुता, संस्कृति, पहचान और भविष्य से जुड़े गंभीर सवाल भी खड़े कर रहा है।
घोषणा में जलवायु अनुकूलन पर जोर
संयुक्त राष्ट्र की नई घोषणा में समुद्र के बढ़ते जलस्तर से प्रभावित देशों और समुदायों की मदद के लिए अनुकूलन (Adaptation) को मजबूत करने पर जोर दिया गया है।
इसका अर्थ है कि देशों को तटीय बाढ़, समुद्री कटाव और अन्य जोखिमों को ध्यान में रखते हुए अपनी योजना और बुनियादी ढांचे को तैयार करना होगा।
WMO के मुताबिक घोषणा में बेहतर डेटा, जोखिम आकलन, शुरुआती चेतावनी प्रणाली और दीर्घकालिक योजना के जरिए आपदा जोखिम कम करने और लचीलापन बढ़ाने पर जोर दिया गया है।
जलवायु वित्त और तकनीकी सहयोग भी अहम
समुद्र के बढ़ते जलस्तर से निपटने के लिए केवल नीतियां बनाना पर्याप्त नहीं माना जा रहा है। विकासशील और कमजोर देशों को वित्तीय संसाधनों, तकनीक और विशेषज्ञता की भी जरूरत होगी।
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने बैठक में कहा कि घोषणा में अनुकूलन, जलवायु वित्त तक पहुंच को तेज करने, प्रभावित आबादी के अधिकारों की रक्षा, विज्ञान और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को मजबूत करने की जरूरत को मान्यता दी गई है।
तटीय बुनियादी ढांचे की सुरक्षा जरूरी
समुद्र के बढ़ते जलस्तर का असर बंदरगाहों, सड़कों, बिजली व्यवस्था, आवास और अन्य महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे पर पड़ सकता है।
संयुक्त राष्ट्र महासभा के अध्यक्ष ने बताया कि वैश्विक व्यापार का 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा बंदरगाहों के माध्यम से होता है। ऐसे में समुद्री बाढ़ और तटीय जोखिमों से बंदरगाहों तथा आपूर्ति श्रृंखला में बाधा आने पर इसका असर दुनिया के अन्य हिस्सों में भी पड़ सकता है।
इसी वजह से नई घोषणा में तटीय क्षेत्रों की तैयारी और दीर्घकालिक योजना को महत्वपूर्ण माना गया है।
प्रभावित लोगों के अधिकारों पर भी ध्यान
समुद्र का बढ़ता जलस्तर कई तटीय समुदायों को विस्थापन की स्थिति में पहुंचा सकता है। ऐसे में केवल बुनियादी ढांचे की सुरक्षा ही नहीं, बल्कि प्रभावित लोगों के अधिकारों और सम्मान की रक्षा भी महत्वपूर्ण है।
संयुक्त राष्ट्र की चर्चा में मानव गतिशीलता, संस्कृति, विरासत और पहचान जैसे मुद्दों को भी समुद्र के बढ़ते जलस्तर से जुड़े व्यापक प्रभावों का हिस्सा माना गया।
समुद्री सीमाओं और राज्य की निरंतरता का मुद्दा
छोटे द्वीपीय देशों के लिए समुद्र के बढ़ते जलस्तर का एक महत्वपूर्ण पहलू उनकी समुद्री सीमाओं और राज्य की निरंतरता से जुड़ा है।
UN बैठक के दौरान छोटे द्वीपीय देशों के समूह ने स्थापित समुद्री क्षेत्रों की स्थिरता और जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्र के बढ़ते स्तर के बावजूद राज्य की निरंतरता के महत्व को रेखांकित किया।
यह मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कुछ द्वीपीय देशों के सामने भविष्य में अपनी भूमि के बड़े हिस्से के प्रभावित होने की आशंका है।
2024 के फैसले के बाद आगे बढ़ी प्रक्रिया
इस घोषणा की प्रक्रिया अचानक शुरू नहीं हुई। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2024 में समुद्र के बढ़ते जलस्तर पर अंतरराष्ट्रीय सहयोग मजबूत करने का निर्णय लिया था।
2024 के फैसले में सदस्य देशों के बीच सहयोग मजबूत करने और समुद्र के बढ़ते जलस्तर से जुड़ी चुनौतियों पर उच्चस्तरीय बैठक आयोजित करने का निर्णय लिया गया था। इसी प्रक्रिया के तहत 2026 में उच्चस्तरीय बैठक आयोजित हुई और राजनीतिक घोषणा को अंतिम रूप दिया गया।
भारत के लिए भी महत्वपूर्ण मुद्दा
भारत की लंबी समुद्री तटरेखा और बड़ी तटीय आबादी को देखते हुए समुद्र का बढ़ता जलस्तर भारत के लिए भी महत्वपूर्ण विषय है।
तटीय बाढ़, समुद्री कटाव, चक्रवात, खारे पानी का बढ़ता प्रभाव और तटीय बुनियादी ढांचे की सुरक्षा जैसे मुद्दे भारत के लिए महत्वपूर्ण हैं।
ऐसे में संयुक्त राष्ट्र की नई घोषणा वैश्विक स्तर पर तटीय जोखिमों से निपटने, वैज्ञानिक डेटा के उपयोग और जलवायु अनुकूलन के लिए सहयोग बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण मंच प्रदान करती है।
निष्कर्ष
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 24 सितंबर 2026 को समुद्र के बढ़ते जलस्तर पर पहली राजनीतिक घोषणा अपनाई। इस घोषणा में समुद्र के बढ़ते जलस्तर को केवल पर्यावरणीय समस्या के बजाय विकास, अर्थव्यवस्था, मानवाधिकार और सुरक्षा से जुड़ी व्यापक चुनौती के रूप में मान्यता दी गई है।
घोषणा में जलवायु अनुकूलन, आपदा जोखिम में कमी, वैज्ञानिक डेटा, शुरुआती चेतावनी प्रणाली, जलवायु वित्त, तकनीकी सहयोग और प्रभावित लोगों के अधिकारों की रक्षा पर जोर दिया गया है।
यह घोषणा समुद्र के बढ़ते जलस्तर से प्रभावित छोटे द्वीपीय देशों और तटीय समुदायों के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर साझा कार्रवाई की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।






