UP FSDA Medicine Price:- UP सरकार का बड़ा फरमान, दवाओं की मनमानी कीमत पर लगेगी लगाम????
UP सरकार का बड़ा फरमान, दवाओं की मनमानी कीमत पर लगेगी लगाम, अस्पतालों को बताना होगा खरीद और बिक्री रेट....
लखनऊ: उत्तर प्रदेश में अस्पतालों की फार्मेसियों में दवाओं की कीमतों को लेकर खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन (FSDA) की जांच के बाद अब पारदर्शिता बढ़ाने की तैयारी की गई है। अस्पतालों में मरीजों को बेची जाने वाली दवाओं की कीमत और उन्हें खरीदने की कीमत के बीच बड़े अंतर के मामले सामने आने के बाद विभाग ने अस्पताल फार्मेसियों को दवाओं की खरीद और बिक्री से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक करने के निर्देश दिए हैं। इसका उद्देश्य मरीजों को यह जानने का अवसर देना है कि अस्पताल ने संबंधित दवा कितने रुपये में खरीदी और उसे कितने रुपये में बेचा जा रहा है।
214 अस्पताल फार्मेसियों की जांच में सामने आया बड़ा अंतर
FSDA की ओर से प्रदेश के मेडिकल कॉलेजों और निजी अस्पतालों की फार्मेसियों में विशेष जांच अभियान चलाया गया। इस दौरान 214 अस्पताल फार्मेसियों से दवाओं की खरीद कीमत और पैक पर दर्ज MRP से संबंधित आंकड़े जुटाए गए। विभाग ने इनमें से 130 दवाओं के खरीद मूल्य और MRP का तुलनात्मक विश्लेषण किया।
जांच में सामने आया कि 36 दवाओं की MRP उनकी खरीद कीमत से 10 गुना से भी अधिक थी। कुछ दवाओं के मामले में यह अंतर 67 गुना तक पहुंच गया। अधिकारियों ने कहा है कि इतनी बड़ी कीमत के अंतर के कारणों की जांच की जा रही है और यह भी देखा जा रहा है कि कीमत और ट्रेड मार्जिन की व्यवस्था में कहीं असामान्य अंतर तो नहीं है।
74 रुपये की दवा की MRP करीब 5 हजार रुपये
जांच में सामने आए आंकड़ों में कुछ इंजेक्शन की कीमतों में बेहद बड़ा अंतर दिखाई दिया। उदाहरण के तौर पर Polymyxin-B injection का एक पैक अस्पताल की फार्मेसी को करीब 74.09 रुपये में मिला, जबकि उस पर छपी MRP 4,980.94 रुपये थी। यानी MRP खरीद कीमत से करीब 67.23 गुना अधिक थी।
इसी तरह Terlipressin injection की खरीद कीमत करीब 56 रुपये दर्ज की गई, जबकि उसकी MRP 3,050 रुपये थी। वहीं Colistimethate Sodium और Tigecycline जैसी कुछ दवाओं में भी खरीद कीमत और MRP के बीच कई गुना का अंतर पाया गया।
एक अन्य महंगी दवा Bevacizumab 400 mg का उदाहरण भी सामने आया। इसकी खरीद कीमत करीब 7,541 रुपये थी, जबकि MRP 69,995 रुपये दर्ज की गई। यानी दोनों कीमतों में 62,000 रुपये से अधिक का अंतर था।
अस्पतालों को सार्वजनिक करनी होगी कीमतों से जुड़ी जानकारी
FSDA की नई व्यवस्था के तहत अस्पतालों की फार्मेसियों और विशेष रूप से इन-पेशेंट मरीजों को दवा उपलब्ध कराने वाली फार्मेसियों को अपनी वेबसाइट पर जरूरी जानकारी उपलब्ध कराने के लिए कहा गया है। इसमें फार्मेसी का लाइसेंस, फार्मासिस्ट से जुड़ी जानकारी, दवाओं की कीमत और स्टॉक जैसी जानकारियां शामिल होंगी।
रिपोर्ट के अनुसार अस्पताल फार्मेसियों को दवाओं के Price to Retailer (PTR) और Price to Consumer (PTC) की जानकारी भी सार्वजनिक करनी होगी। इसके साथ दवा के निर्माता, ब्रांड नाम और जेनेरिक नाम की जानकारी उपलब्ध कराने की व्यवस्था की जा रही है।
कुछ रिपोर्टों के मुताबिक मरीजों के लिए यह जानकारी QR कोड के माध्यम से मोबाइल पर उपलब्ध कराने की भी तैयारी है। इससे मरीज दवा खरीदते समय उसकी कीमत से संबंधित जानकारी आसानी से देख सकेंगे।
अस्पतालों और दवा कंपनियों पर बढ़ेगी निगरानी
FSDA की जांच केवल दवाओं की कीमत तक सीमित नहीं है। विभाग अस्पताल फार्मेसियों में लाइसेंस, स्टॉक, बिलिंग, दवाओं की उपलब्धता, फार्मासिस्ट की मौजूदगी, मेडिकल ऑक्सीजन, कोल्ड-चेन और दवाओं के रखरखाव जैसे पहलुओं की भी जांच कर रहा है।
लखनऊ में 30 सितंबर और 1 अक्टूबर को 12 निजी अस्पतालों की फार्मेसियों में 26 ड्रग इंस्पेक्टरों की टीम ने जांच की थी। इस दौरान दवाओं की खरीद और मरीजों से वसूले जाने वाले बिक्री मूल्य के बीच अंतर की भी जांच की गई। विभाग ने कुछ मामलों में खरीद कीमत और मरीजों से लिए जाने वाले मूल्य के बीच बड़ा अंतर पाया था।
प्रदेश स्तर पर 17 जिलों में किए गए विशेष अभियान में सरकारी मेडिकल कॉलेज, निजी मेडिकल कॉलेज और निजी अस्पतालों की फार्मेसियों को जांच के दायरे में शामिल किया गया। अधिकारियों ने दवाओं की खरीद कीमत और मरीजों को बिक्री कीमत के रिकॉर्ड की भी पड़ताल की।
मरीजों को क्या फायदा होगा?
इस व्यवस्था का सबसे बड़ा असर दवाओं की कीमतों में पारदर्शिता पर पड़ सकता है। अस्पताल में भर्ती मरीजों और उनके परिजनों के लिए यह समझना आसान होगा कि किसी दवा की खरीद कीमत और बिक्री कीमत में कितना अंतर है।
खास तौर पर गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों को एक साथ कई महंगी दवाएं खरीदनी पड़ती हैं। ऐसे में यदि उन्हें दवा के PTR और PTC जैसी जानकारी उपलब्ध रहती है, तो वे बिल में दर्ज कीमत को बेहतर तरीके से समझ सकेंगे।
हालांकि, किसी दवा की खरीद कीमत और MRP में अंतर अपने आप में अवैध मुनाफाखोरी साबित नहीं करता। दवा की कीमत में निर्माता, वितरक, थोक विक्रेता, खुदरा मार्जिन, कर और अन्य व्यावसायिक लागत जैसे कई घटक हो सकते हैं। इसी वजह से FSDA इस बड़े अंतर के कारणों की भी जांच कर रहा है।
नियमों का पालन नहीं करने पर कार्रवाई की तैयारी
FSDA की जांच में सामने आए मामलों के आधार पर संबंधित अस्पतालों, दवा आपूर्तिकर्ताओं और निर्माताओं से स्पष्टीकरण मांगे जाने की प्रक्रिया भी शुरू की गई है। विभाग आगे की जांच के आधार पर आवश्यक कार्रवाई कर सकता है।
सरकार की इस पहल का मुख्य फोकस दवा की गुणवत्ता के साथ-साथ कीमत और खरीद-बिक्री व्यवस्था में पारदर्शिता बढ़ाना है। आने वाले समय में अस्पताल फार्मेसियों की जांच और तेज होने की संभावना है।
मरीजों के लिए जरूरी बात
अस्पताल से दवा खरीदते समय मरीज या उनके परिजन दवा का बिल जरूर लें, दवा के पैक पर दर्ज MRP देखें और बिल में दवा का नाम, मात्रा तथा बिक्री मूल्य जांचें। यदि अस्पताल की फार्मेसी में खरीद कीमत, बिक्री कीमत या बिलिंग को लेकर कोई संदेह हो तो संबंधित दस्तावेज सुरक्षित रखना शिकायत या जांच के दौरान उपयोगी हो सकता है।
FSDA की कार्रवाई के बाद अब अस्पतालों में दवाओं की कीमतों से जुड़ी जानकारी को अधिक पारदर्शी बनाने की दिशा में कदम उठाया जा रहा है। आने वाले दिनों में यह व्यवस्था मरीजों को दवा की वास्तविक कीमत और अस्पताल की बिक्री कीमत के बीच अंतर समझने में मदद कर सकती है।






