गुजरात के अंबाजी मंदिर के प्रसिद्ध मोहनथाल प्रसाद को मिला GI टैग, पारंपरिक पहचान को मिलेगी कानूनी सुरक्षा ???
अंबाजी मंदिर के मोहनथाल प्रसाद को मिला GI टैग, जानें क्या होगा फायदा...
अंबाजी, गुजरात। गुजरात के प्रसिद्ध अंबाजी मंदिर में श्रद्धालुओं को चढ़ाए जाने वाले पारंपरिक मोहनथाल प्रसाद को भौगोलिक संकेतक यानी GI टैग मिल गया है। यह मान्यता अंबाजी के मोहनथाल की विशिष्ट क्षेत्रीय और धार्मिक पहचान को आधिकारिक संरक्षण प्रदान करती है। GI रजिस्ट्री के रिकॉर्ड के अनुसार, इस उत्पाद का पंजीकरण 1 अक्टूबर 2026 को किया गया। इसके बाद नवरात्रि के पहले दिन मंदिर परिसर में आयोजित कार्यक्रम में श्री आरासुरी अंबाजी माता देवस्थान ट्रस्ट को प्रमाणपत्र सौंपा गया। <Cite refs={[“turn505182search0″,”turn505182search3”]}/>
यह उपलब्धि केवल एक मिठाई को पहचान मिलने तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे अंबाजी मंदिर की प्रसाद परंपरा, स्थानीय संस्कृति और पीढ़ियों से चली आ रही खाद्य विरासत को भी महत्व मिला है। अब अंबाजी के मोहनथाल को उसके विशिष्ट नाम और क्षेत्रीय पहचान के साथ देशभर में अलग पहचान बनाने का अवसर मिलेगा।
क्या है मोहनथाल और क्यों है यह खास?
मोहनथाल गुजरात और राजस्थान सहित पश्चिम भारत के कई हिस्सों में बनाई जाने वाली पारंपरिक मिठाई है। इसे आम तौर पर बेसन, घी, चीनी या चाशनी और इलायची जैसे सुगंधित पदार्थों से तैयार किया जाता है। कुछ विधियों में मेवे भी मिलाए जाते हैं। इसकी बनावट दानेदार और स्वाद समृद्ध होता है।
अंबाजी मंदिर में मोहनथाल का विशेष धार्मिक महत्व है। यह मां अंबा को अर्पित किए जाने वाले प्रसिद्ध प्रसादों में शामिल है और मंदिर आने वाले श्रद्धालु इसे आस्था के साथ ग्रहण करते हैं। इसकी पहचान मंदिर की पूजा-पद्धति और स्थानीय धार्मिक परंपराओं से जुड़ी हुई है।
हालांकि मोहनथाल अलग-अलग क्षेत्रों में भी बनाया जाता है, अंबाजी मंदिर से जुड़े पारंपरिक प्रसाद की विशिष्ट पहचान ही इस GI पंजीकरण का प्रमुख आधार है।
GI टैग मिलने से क्या फायदा होगा?
GI टैग किसी ऐसे उत्पाद को दिया जाता है जिसकी विशेष पहचान, प्रतिष्ठा या गुण किसी खास भौगोलिक क्षेत्र से जुड़े हों। भारत में इसका पंजीकरण भौगोलिक संकेतक रजिस्ट्री के माध्यम से किया जाता है।
अंबाजी मोहनथाल को GI टैग मिलने से इसके नाम और क्षेत्रीय पहचान को कानूनी संरक्षण प्राप्त होगा। इससे अनधिकृत इस्तेमाल और गलत तरीके से क्षेत्रीय पहचान का दावा करने जैसे मामलों के खिलाफ कार्रवाई का आधार मजबूत हो सकता है। साथ ही, पारंपरिक तरीके से तैयार किए जाने वाले इस प्रसाद की पहचान बनाए रखने में भी सहायता मिलेगी। <Cite refs={[“turn505182search0″,”turn505182search3”]}/>
इस मान्यता से मंदिर ट्रस्ट और संबंधित हितधारकों को प्रसाद की विशिष्टता के प्रति जागरूकता बढ़ाने का अवसर मिलेगा। हालांकि GI टैग अपने आप में यह गारंटी नहीं देता कि हर उत्पाद की गुणवत्ता समान होगी; इसके लिए संबंधित नियमों और मानकों का पालन भी महत्वपूर्ण रहता है।
नवरात्रि के पहले दिन सौंपा गया प्रमाणपत्र
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, नवरात्रि के पहले दिन अंबाजी मंदिर के चाचर चौक में आयोजित विशेष समारोह के दौरान श्री आरासुरी अंबाजी माता देवस्थान ट्रस्ट को GI प्रमाणपत्र सौंपा गया। कार्यक्रम में पेटेंट, डिजाइन एवं ट्रेडमार्क के कंट्रोलर जनरल और GI रजिस्ट्री से जुड़े अधिकारी डॉ. उन्नत पी. पंडित तथा बनासकांठा के जिला कलेक्टर मिहिर पटेल सहित अन्य प्रतिनिधियों की मौजूदगी की खबर है। <Cite refs={[“turn505182search1″,”turn505182search3”]}/>
प्रमाणपत्र मिलने से मंदिर की पारंपरिक प्रसाद व्यवस्था को एक औपचारिक पहचान मिली है। यह उपलब्धि उन श्रद्धालुओं के लिए भी महत्वपूर्ण है जिनकी धार्मिक आस्था अंबाजी मंदिर और वहां के प्रसाद से जुड़ी हुई है।
GI टैग क्या होता है?
GI यानी Geographical Indication टैग किसी उत्पाद की उस विशिष्ट पहचान को दर्शाता है जो उसके भौगोलिक क्षेत्र से जुड़ी होती है। यह पहचान कृषि उत्पादों, खाद्य पदार्थों, प्राकृतिक वस्तुओं, हस्तशिल्प और निर्मित उत्पादों को मिल सकती है।
भारत में GI पंजीकरण का उद्देश्य किसी क्षेत्र से जुड़े विशिष्ट उत्पादों की पहचान को सुरक्षित रखना और उनके नाम के अनुचित इस्तेमाल को रोकने में मदद करना है। दार्जिलिंग चाय, कांचीपुरम सिल्क और तिरुपति लड्डू जैसे उत्पाद इसके चर्चित उदाहरण हैं।
अंबाजी मोहनथाल का पंजीकरण खाद्य पदार्थों की क्लास 30 के अंतर्गत हुआ है। आधिकारिक GI रजिस्ट्री में आवेदन संख्या 1228 और प्रमाणपत्र संख्या 835 दर्ज है। रिकॉर्ड के मुताबिक, पंजीकरण की वैधता 17 अप्रैल 2034 तक है। <Cite refs={[“turn505182search0”]}/>
तिरुपति लड्डू और पलानी पंचामृतम की श्रेणी में मिली पहचान
देश के कई मंदिरों के विशिष्ट प्रसाद अपनी धार्मिक परंपरा और क्षेत्रीय पहचान के लिए जाने जाते हैं। तिरुपति लड्डू और तमिलनाडु के पलानी मंदिर का पंचामृतम ऐसे उदाहरण हैं जिन्हें GI पंजीकरण प्राप्त है। अंबाजी मोहनथाल को मिली मान्यता भी इसी तरह धार्मिक परंपरा से जुड़े खाद्य उत्पाद की विशिष्ट पहचान को संरक्षण देने की दिशा में महत्वपूर्ण है। <Cite refs={[“turn505182search3″,”turn505182search4”]}/>
इस तरह के पंजीकरण से स्थानीय परंपराओं और उत्पादों की पहचान को दस्तावेजी रूप मिलता है। साथ ही, लोगों को यह समझने में मदद मिलती है कि किसी उत्पाद की विशेषता केवल उसके स्वाद में नहीं, बल्कि उसके इतिहास, परंपरा और स्थान से जुड़े संबंध में भी होती है।
गुजरात की सांस्कृतिक विरासत को मिलेगा बढ़ावा
गुजरात अपनी धार्मिक परंपराओं, मंदिरों, हस्तशिल्प और पारंपरिक खानपान के लिए जाना जाता है। अंबाजी मंदिर राज्य के प्रमुख तीर्थस्थलों में से एक है, जहां विशेष अवसरों और नवरात्रि के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।
मोहनथाल को GI टैग मिलने से अंबाजी की पहचान को धार्मिक पर्यटन और पारंपरिक खाद्य विरासत के संदर्भ में आगे बढ़ाने का अवसर मिलेगा। इससे स्थानीय परंपरा के संरक्षण, जागरूकता और संबंधित उत्पाद की पहचान पर सकारात्मक ध्यान केंद्रित हो सकता है। हालांकि पर्यटन या स्थानीय कारोबार पर इसका वास्तविक प्रभाव मांग, आपूर्ति और प्रबंधन जैसे अन्य कारकों पर भी निर्भर करेगा।
निष्कर्ष
गुजरात के अंबाजी मंदिर के प्रसिद्ध मोहनथाल प्रसाद को GI टैग मिलना धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि है। 1 अक्टूबर 2026 को पंजीकरण प्रमाणपत्र जारी होने के बाद नवरात्रि के पहले दिन इसे मंदिर ट्रस्ट को सौंपा गया। इस मान्यता से अंबाजी मोहनथाल की क्षेत्रीय पहचान को कानूनी संरक्षण मिलेगा और मंदिर से जुड़ी पारंपरिक प्रसाद परंपरा को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने में मदद मिल सकती है।
स्रोत: भारत सरकार की भौगोलिक संकेतक रजिस्ट्री तथा प्रकाशित समाचार रिपोर्टें।






