Skyroot Aerospace और अमेरिकी कंपनी Reflect Orbital के बीच समझौता, अंतरिक्ष से रात में मिलेगी सूरज की रोशनी ???
भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए क्यों अहम है यह समझौता...
Skyroot Aerospace-Reflect Orbital Deal: भारत की निजी अंतरिक्ष कंपनी स्काईरूट एयरोस्पेस (Skyroot Aerospace) ने अमेरिका की स्पेस टेक्नोलॉजी स्टार्टअप कंपनी रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल (Reflect Orbital) के साथ दो विशेष रॉकेट लॉन्च करने का समझौता किया है। इस समझौते का उद्देश्य ऐसे उपग्रहों को अंतरिक्ष में पहुंचाना है, जो बड़े परावर्तक दर्पणों की मदद से सूर्य के प्रकाश को पृथ्वी के चुनिंदा क्षेत्रों की ओर मोड़ सकेंगे। कंपनी की योजना इस तकनीक से रात में जरूरत के मुताबिक रोशनी उपलब्ध कराने की है।
कैसे काम करेगी अंतरिक्ष से रोशनी देने वाली तकनीक?
Reflect Orbital की योजना ऐसे उपग्रह विकसित करने की है, जिन पर बड़े परावर्तक दर्पण लगाए जाएंगे। ये दर्पण अंतरिक्ष में सूर्य की रोशनी को पकड़कर पृथ्वी के किसी खास हिस्से की ओर परावर्तित करने का प्रयास करेंगे। इस तरह सूर्यास्त के बाद भी चुनिंदा स्थानों पर अतिरिक्त रोशनी पहुंचाई जा सकेगी।
किन क्षेत्रों में हो सकता है इस्तेमाल?
1. आपदा के समय खोज और बचाव अभियान
बाढ़, भूकंप या अन्य आपदाओं के बाद रात में दुर्गम क्षेत्रों में फंसे लोगों को तलाशना मुश्किल होता है। कंपनी का मानना है कि अंतरिक्ष से अतिरिक्त रोशनी मिलने पर बचाव दलों को काम करने में सहायता मिल सकती है।
2. सौर ऊर्जा उत्पादन
सौर ऊर्जा संयंत्रों पर सूर्य की रोशनी पड़ने से बिजली बनती है। यदि दर्पणों से अतिरिक्त प्रकाश उपलब्ध कराया जा सके, तो सौर पैनलों के उत्पादन समय को बढ़ाने की संभावना का परीक्षण किया जा सकता है। लेकिन रात में इससे कितनी अतिरिक्त बिजली बनेगी, यह अभी साबित होना बाकी है।
3. निर्माण और औद्योगिक गतिविधियां
दूरदराज के निर्माण स्थलों और औद्योगिक क्षेत्रों में अतिरिक्त रोशनी से रात में काम करने में मदद मिल सकती है। कंपनी ऐसे संभावित उपयोगों को अपनी तकनीक के प्रमुख अनुप्रयोगों में गिनती है।
इन सभी क्षेत्रों में वास्तविक उपयोगिता का आकलन उपग्रहों के प्रक्षेपण और परीक्षण के बाद ही किया जा सकेगा।
समझौते के तहत दो अलग-अलग लॉन्च की योजना है:
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पहला लॉन्च — विक्रम-1 (Vikram-1): इस रॉकेट से Reflect Orbital के एक भावी अंतरिक्ष मिशन को लॉन्च किया जाएगा।
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दूसरा लॉन्च — विक्रम-1U (Vikram-1U): दूसरा मिशन स्काईरूट के विकसित किए जा रहे रॉकेट से होगा। कंपनी के अनुसार, इसमें अतिरिक्त प्रथम-चरण बूस्टर और बेहतर प्रदर्शन की क्षमता होगी।
समझौते की घोषणा 14 अक्टूबर 2026 को की गई थी। दोनों कंपनियों ने अभी तक लॉन्च की निश्चित तारीख और अनुबंध की वित्तीय शर्तें सार्वजनिक नहीं की हैं।
हैदराबाद स्थित स्काईरूट एयरोस्पेस भारत की निजी अंतरिक्ष कंपनियों में शामिल है। कंपनी की स्थापना 2018 में हुई थी और इसका उद्देश्य उपग्रहों को अंतरिक्ष तक पहुंचाने के लिए रॉकेट विकसित करना है।
जुलाई 2026 में स्काईरूट के विक्रम-1 रॉकेट ने अपनी पहली उड़ान में सफलतापूर्वक कक्षा हासिल की थी। Reflect Orbital के साथ नया समझौता कंपनी को एक और अंतरराष्ट्रीय ग्राहक उपलब्ध कराता है और भारत की निजी लॉन्च सेवाओं के लिए नए व्यावसायिक अवसर खोल सकता है।
इस तरह का सहयोग यह भी दिखाता है कि अंतरिक्ष तकनीक का इस्तेमाल केवल संचार, मौसम और पृथ्वी के अवलोकन तक सीमित नहीं है। निजी कंपनियां अब ऊर्जा, आपदा प्रबंधन और औद्योगिक सेवाओं के लिए भी अंतरिक्ष आधारित समाधानों पर काम कर रही हैं।
योजना के सामने क्या हैं चुनौतियां?
रात में सूर्य का प्रकाश परावर्तित करने की योजना के साथ कुछ महत्वपूर्ण सवाल भी जुड़े हैं। खगोलविदों और पर्यावरण से जुड़े संगठनों ने चिंता जताई है कि तेज परावर्तित रोशनी से दूरबीनों के जरिए अंतरिक्ष का अध्ययन प्रभावित हो सकता है। रात के प्राकृतिक अंधेरे में बदलाव का असर वन्यजीवों और अन्य पर्यावरणीय प्रक्रियाओं पर भी पड़ सकता है।
इसके अतिरिक्त यह देखना होगा कि बादल, उपग्रह की स्थिति, पृथ्वी की छाया और उपलब्ध सूर्यप्रकाश इस सेवा की निरंतरता को किस तरह प्रभावित करते हैं। अंतरिक्ष में उपग्रह भेजना, उनका संचालन करना और किसी निश्चित क्षेत्र पर नियंत्रित रोशनी डालना तकनीकी रूप से जटिल काम है।
Reflect Orbital ने कहा है कि वह अपनी योजना को आगे बढ़ाने के दौरान खगोलविदों, स्थानीय समुदायों और नियामकों के साथ विचार-विमर्श करेगी। अभी इस तकनीक के बड़े पैमाने पर व्यावसायिक इस्तेमाल की सफलता सुनिश्चित नहीं है।
स्काईरूट एयरोस्पेस और अमेरिकी कंपनी Reflect Orbital के बीच दो लॉन्च का समझौता अंतरिक्ष तकनीक के एक नए संभावित इस्तेमाल की दिशा में कदम है। यदि प्रयोग सफल होते हैं, तो भविष्य में अंतरिक्ष में लगे दर्पणों के माध्यम से रात में चुनिंदा स्थानों पर अतिरिक्त रोशनी पहुंचाने की संभावना विकसित हो सकती है।
फिलहाल यह याद रखना जरूरी है कि समझौता हो चुका है, लेकिन रात में सूर्य का प्रकाश उपलब्ध कराने वाली सेवा अभी शुरू नहीं हुई है। इसकी वास्तविक क्षमता और पर्यावरण पर असर का पता आगामी परीक्षणों से ही चलेगा





