Tiger Reintroduction: पश्चिम बंगाल के बक्सा टाइगर रिजर्व में पहली बाघिन की एंट्री, शुरू हुआ टाइगर पुनर्वास कार्यक्रम ???
Buxa Tiger Reserve: पश्चिम बंगाल के बक्सा टाइगर रिजर्व में बाघों को फिर से बसाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया गया है...
बिहार के वाल्मीकि टाइगर रिजर्व से लाई गई पहली बाघिन को 2 अक्टूबर 2026 को बक्सा टाइगर रिजर्व में छोड़ा गया। इसके साथ ही यहां चरणबद्ध Tiger Reintroduction Programme की शुरुआत हो गई है।
भारत में वन्यजीव संरक्षण के लिहाज से यह एक महत्वपूर्ण पहल मानी जा रही है। पश्चिम बंगाल के अलीपुरद्वार जिले में स्थित बक्सा टाइगर रिजर्व में लंबे समय से स्थायी बाघ आबादी नहीं थी। अब वैज्ञानिक तरीके से बाघों को दोबारा बसाने की योजना शुरू की गई है।
इस पहल के तहत बिहार के वाल्मीकि टाइगर रिजर्व से एक तीन वर्षीय रॉयल बंगाल बाघिन को बक्सा लाया गया। इस बाघिन की पहचान T138 के रूप में की गई है। इसे चरणबद्ध पुनर्वास कार्यक्रम के पहले चरण के तौर पर देखा जा रहा है।
बक्सा में शुरू हुआ Tiger Reintroduction Programme
2 अक्टूबर को बक्सा टाइगर रिजर्व में बाघिन को छोड़े जाने के साथ ही पश्चिम बंगाल में बाघ पुनर्वास की इस बड़ी योजना की शुरुआत हुई। इस अवसर पर केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी मौजूद रहे।
केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के मुताबिक इस कार्यक्रम का उद्देश्य केवल बाघों को बक्सा में लाना नहीं है, बल्कि ऐसा पारिस्थितिक वातावरण तैयार करना है जिसमें बाघों की आबादी आगे चलकर स्थायी, स्वस्थ और आत्मनिर्भर बन सके।
कार्यक्रम में आवास सुधार, शिकार प्रजातियों की संख्या बढ़ाना, सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करना, वैज्ञानिक निगरानी और स्थानीय समुदायों की भागीदारी को महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया गया है।
वाल्मीकि टाइगर रिजर्व से लाई गई T138
बक्सा में छोड़ी गई बाघिन को बिहार के वाल्मीकि टाइगर रिजर्व से लाया गया है। अधिकारियों के अनुसार, स्थानांतरण से पहले बाघिन की पारिस्थितिक, पशु चिकित्सा और प्रबंधन संबंधी परिस्थितियों का आकलन किया गया।
रिपोर्टों के मुताबिक यह करीब तीन साल की बाघिन है और इसका वजन लगभग 150 किलोग्राम बताया गया है। इसे पहले बिहार से पश्चिम बंगाल लाया गया और आवश्यक स्वास्थ्य जांच के बाद बक्सा के निर्धारित क्षेत्र में रखा गया।
बाघिन को सैटेलाइट कॉलर लगाया गया है, जिससे उसके मूवमेंट पर नजर रखी जा सकेगी। इसके अलावा कैमरा ट्रैप और जमीन पर तैनात निगरानी टीमों के माध्यम से भी उसकी गतिविधियों को रिकॉर्ड किया जाएगा।
बक्सा में पहले क्यों नहीं थी स्थायी बाघ आबादी?
बक्सा टाइगर रिजर्व को वर्ष 1983 में टाइगर रिजर्व घोषित किया गया था। यह क्षेत्र उत्तर बंगाल के महत्वपूर्ण वन्यजीव परिदृश्य का हिस्सा है और इसकी पारिस्थितिक कनेक्टिविटी असम तथा भूटान के जंगलों से जुड़ती है।
हालांकि समय के साथ आवास में बदलाव, जंगलों का विखंडन, भूमि उपयोग में परिवर्तन और शिकार प्रजातियों की उपलब्धता में कमी जैसी परिस्थितियों ने यहां स्थायी बाघ आबादी बनाए रखने को चुनौती दी। लंबे समय तक यहां स्थायी निवासी बाघों की आबादी की पुष्टि नहीं हुई।
इसके बावजूद बक्सा में बाघों की आवाजाही के संकेत मिलते रहे हैं। कैमरा ट्रैप के जरिए 2021, 2023 और 2026 में बाघों की मौजूदगी दर्ज की गई। 2023 में एक बाघ की पहचान असम के मानस टाइगर रिजर्व से जुड़े बाघ के रूप में की गई थी, जिससे आसपास के बाघ परिदृश्यों के बीच प्राकृतिक आवाजाही के संकेत मिले।
2018 से चल रही थी बक्सा को तैयार करने की प्रक्रिया
बक्सा में बाघों की वापसी के लिए तैयारियां अचानक शुरू नहीं हुई हैं। पश्चिम बंगाल सरकार ने राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण यानी NTCA और Wildlife Institute of India (WII) के सहयोग से वर्ष 2018 से Tiger Augmentation and Recovery Project पर काम किया है।
इस दौरान बाघों के लिए जरूरी पारिस्थितिक परिस्थितियों को बेहतर बनाने पर ध्यान दिया गया। इसमें जंगल और घास के मैदानों का सुधार, शिकार प्रजातियों की संख्या बढ़ाना, सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करना और वैज्ञानिक निगरानी शामिल रही।
केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के अनुसार, बक्सा के शिकार आधार को मजबूत करने के लिए 800 से अधिक चीतल छोड़े गए हैं। इसके अलावा लगभग 380 हेक्टेयर घासभूमि को बहाल या विकसित किया गया है। इससे बाघों के लिए पर्याप्त शिकार उपलब्ध कराने में मदद मिलने की उम्मीद है।
बाघिन की हर गतिविधि पर रहेगी नजर
बक्सा में छोड़े जाने के बाद T138 की निगरानी बेहद महत्वपूर्ण होगी। इसके लिए कई स्तरों पर मॉनिटरिंग की व्यवस्था की गई है।
बाघिन के शरीर पर लगे कॉलर से उसकी लोकेशन और गतिविधियों की जानकारी हासिल की जाएगी। इसके साथ ही कैमरा ट्रैप और फील्ड टीमों की मदद से उसके व्यवहार, स्वास्थ्य, मूवमेंट और नए वातावरण में अनुकूलन का अध्ययन किया जाएगा।
विशेषज्ञों के लिए शुरुआती कुछ सप्ताह और महीने खास तौर पर महत्वपूर्ण होंगे। इस दौरान यह देखा जाएगा कि बाघिन नए क्षेत्र में किस तरह घूमती है, शिकार की उपलब्धता का उपयोग कैसे करती है और अपने नए आवास के साथ किस तरह अनुकूलित होती है।
आगे और बाघ लाने की योजना
बक्सा में सिर्फ एक बाघिन को छोड़ना इस पूरे कार्यक्रम का अंतिम लक्ष्य नहीं है। इसका उद्देश्य धीरे-धीरे ऐसी आबादी तैयार करना है जो भविष्य में खुद को बनाए रखने में सक्षम हो।
पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने बताया कि आने वाले दो महीनों में बक्सा में तीन और बाघ लाने की योजना है। हालांकि आगे का पुनर्वास वैज्ञानिक आकलन, आवास की क्षमता, शिकार आधार और निगरानी के परिणामों के आधार पर किया जाएगा।
स्थानीय लोगों की भागीदारी भी जरूरी
बाघों की वापसी के साथ मानव-वन्यजीव संघर्ष की संभावना को ध्यान में रखते हुए स्थानीय समुदायों की भागीदारी को भी कार्यक्रम का हिस्सा बनाया गया है।
केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के अनुसार बक्सा क्षेत्र में 64 Eco-Development Committees और Joint Forest Management Committees को कार्यक्रम से जोड़ा गया है। स्थानीय लोगों के साथ संवाद, आजीविका के अवसर, मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने और संरक्षण से मिलने वाले लाभों पर जोर दिया जा रहा है।
बक्सा में बाघों की वापसी क्यों महत्वपूर्ण?
बक्सा का स्थान इसे वन्यजीव संरक्षण के लिए खास बनाता है। यह उत्तर बंगाल के जंगलों को असम और भूटान के बड़े वन्यजीव परिदृश्य से जोड़ने वाले क्षेत्र का हिस्सा है।
अगर यहां बाघों की स्थायी आबादी स्थापित होती है, तो इसका प्रभाव केवल एक प्रजाति के संरक्षण तक सीमित नहीं रहेगा। इससे जंगल, घासभूमि, शिकार प्रजातियों और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण को भी मजबूती मिल सकती है।
सिर्फ बाघ छोड़ना नहीं, आत्मनिर्भर आबादी बनाना लक्ष्य
बक्सा Tiger Reintroduction Programme की सफलता का आकलन केवल इस आधार पर नहीं किया जाएगा कि कितने बाघ यहां छोड़े गए। असली लक्ष्य एक ऐसी आबादी स्थापित करना है जो जंगल में स्वतंत्र रूप से रह सके, प्रजनन कर सके और लंबे समय तक खुद को बनाए रख सके।
इसके लिए पर्याप्त शिकार, सुरक्षित आवास, मजबूत सुरक्षा व्यवस्था, जंगलों के बीच कनेक्टिविटी और स्थानीय समुदायों का सहयोग जरूरी होगा।
निष्कर्ष
पश्चिम बंगाल के बक्सा टाइगर रिजर्व में पहली बाघिन T138 को छोड़ना राज्य के बाघ संरक्षण अभियान में महत्वपूर्ण कदम है। बिहार के वाल्मीकि टाइगर रिजर्व से लाई गई इस बाघिन के साथ बक्सा में चरणबद्ध Tiger Reintroduction Programme की शुरुआत हुई है।
अब बाघिन की गतिविधियों पर सैटेलाइट कॉलर, कैमरा ट्रैप और फील्ड मॉनिटरिंग के जरिए नजर रखी जाएगी। आगे वैज्ञानिक आकलन के आधार पर और बाघों को यहां लाने की योजना है। लंबे समय में इस कार्यक्रम का लक्ष्य बक्सा में एक स्वस्थ, स्वतंत्र और आत्मनिर्भर बाघ आबादी स्थापित करना है।






