कर्नाटक के मैसूरु में आदिवासी भाषाओं और संग्रहालयों पर राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित, संरक्षण और डिजिटल दस्तावेजीकरण पर मंथन ???
मैसूरु में आदिवासी भाषाओं और संग्रहालयों पर राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित...
National Conclave on Tribal Languages and Museums: कर्नाटक के मैसूरु में आदिवासी भाषाओं, संस्कृति और जनजातीय विरासत के संरक्षण को लेकर एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया। जनजातीय कार्य मंत्रालय की ओर से आयोजित तीन दिवसीय ‘नेशनल कॉन्क्लेव ऑन ट्राइबल लैंग्वेजेज एंड म्यूजियम्स’ में नीति-निर्माता, भाषाविद्, शोधकर्ता, तकनीकी विशेषज्ञ और आदिवासी समुदायों के प्रतिनिधि एक मंच पर जुटे। सम्मेलन 24 से 26 अगस्त 2026 तक आयोजित किया गया।
सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य भारत की आदिवासी भाषाओं का दस्तावेजीकरण, संरक्षण और पुनर्जीवन करना था। इसके साथ ही देशभर में जनजातीय संग्रहालयों और Tribal Freedom Fighter Museums (TFFMs) को और मजबूत बनाने पर भी चर्चा की गई।
आदिवासी भाषा के साथ जुड़ी होती है पूरी संस्कृति
सम्मेलन में इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि किसी भाषा का समाप्त होना केवल शब्दों का खो जाना नहीं है, बल्कि उसके साथ उस समुदाय की परंपराएं, लोककथाएं, पारंपरिक ज्ञान और सांस्कृतिक स्मृतियां भी प्रभावित होती हैं।
कर्नाटक सरकार के जनजातीय कल्याण विभाग की सचिव कनगवल्ली ने अपने संबोधन में कहा कि आदिवासी भाषाओं के संरक्षण के लिए सामूहिक प्रयासों की जरूरत है, क्योंकि भाषा के लुप्त होने के साथ उससे जुड़ी संस्कृति और परंपराओं का भी नुकसान होता है।
भारत में कई आदिवासी समुदायों की भाषाएं पीढ़ियों से मौखिक परंपरा के माध्यम से आगे बढ़ती रही हैं। आधुनिक शिक्षा, शहरीकरण और बदलती जीवनशैली के कारण कुछ भाषाओं के सामने संरक्षण की चुनौती खड़ी हो रही है। ऐसे में भाषाओं का वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
‘आदि वाणी’ प्लेटफॉर्म का उन्नत संस्करण लॉन्च
सम्मेलन की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक Adi Vaani Platform का उन्नत संस्करण लॉन्च करना रहा। इस प्लेटफॉर्म में नई सुविधाओं को जोड़ा गया है।
नई पहल के तहत—
- आदि वाणी का नया लोगो लॉन्च किया गया
- iOS एप्लिकेशन शुरू किया गया
- प्लेटफॉर्म में पांच नई आदिवासी भाषाएं जोड़ी गईं
- डिजिटल माध्यम से भाषा संरक्षण को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया
इस पहल का उद्देश्य तकनीक के माध्यम से आदिवासी भाषाओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाना और उनके दस्तावेजीकरण को आसान बनाना है।
मंत्रालय का AI चैटबॉट ‘Jago’ भी लॉन्च
सम्मेलन के दौरान जनजातीय कार्य मंत्रालय ने अपना आधिकारिक AI आधारित संवाद सहायक ‘Jago’ भी लॉन्च किया। इसके साथ इसका शुभंकर भी पेश किया गया।
AI तकनीक के बढ़ते उपयोग के बीच इस पहल को जनजातीय समुदायों से जुड़ी जानकारी और सेवाओं को अधिक सुलभ बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। डिजिटल प्लेटफॉर्म और AI आधारित सेवाओं के जरिए सरकारी योजनाओं तथा जनजातीय भाषाओं से संबंधित जानकारी को व्यापक स्तर पर पहुंचाने की संभावना बढ़ सकती है।
जनजातीय कार्य मंत्रालय और CIIL के बीच हुआ MoU
सम्मेलन में एक अन्य महत्वपूर्ण कदम के तहत जनजातीय कार्य मंत्रालय और Central Institute of Indian Languages (CIIL) के बीच समझौता ज्ञापन यानी MoU पर हस्ताक्षर किए गए।
इस समझौते के तहत आदिवासी भाषाओं के—
- दस्तावेजीकरण
- भाषा संबंधी डेटा संग्रह
- कॉर्पस डेवलपमेंट
- शोध और संरक्षण
के क्षेत्र में सहयोग को मजबूत किया जाएगा। CIIL मंत्रालय को आदिवासी भाषाओं से संबंधित डेटा और विशेषज्ञता उपलब्ध कराने में सहयोग करेगा।
संग्रहालयों को जनजातीय इतिहास का जीवंत केंद्र बनाने पर चर्चा
राष्ट्रीय सम्मेलन में केवल भाषाओं पर ही नहीं, बल्कि जनजातीय संग्रहालयों और जनजातीय स्वतंत्रता सेनानी संग्रहालयों को मजबूत बनाने पर भी विचार-विमर्श किया गया।
संग्रहालयों को केवल पुरानी वस्तुओं के प्रदर्शन स्थल के बजाय जनजातीय इतिहास, संस्कृति, कला, परंपराओं और स्वतंत्रता संग्राम में आदिवासी समुदायों के योगदान को प्रस्तुत करने वाले जीवंत केंद्र के रूप में विकसित करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया।
इन संग्रहालयों के माध्यम से युवा पीढ़ी को जनजातीय समुदायों की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने की योजना पर भी चर्चा हुई।
देशभर के विशेषज्ञों ने साझा किए विचार
मैसूरु में आयोजित इस सम्मेलन में सरकार, अकादमिक संस्थानों, शोध संगठनों, तकनीकी विशेषज्ञों और आदिवासी समुदायों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। सम्मेलन ने विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों को एक साझा मंच प्रदान किया, जहां आदिवासी भाषाओं और सांस्कृतिक विरासत के सामने मौजूद चुनौतियों पर चर्चा की गई।
विशेषज्ञों ने तकनीक, डिजिटल दस्तावेजीकरण, सामुदायिक भागीदारी और शैक्षणिक संस्थानों की भूमिका को आदिवासी भाषाओं के संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण बताया।
नई पीढ़ी को जोड़ने की चुनौती
आदिवासी भाषाओं के संरक्षण की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक नई पीढ़ी को अपनी मातृभाषा और पारंपरिक ज्ञान से जोड़े रखना है। यदि युवा पीढ़ी अपनी भाषा का उपयोग कम करने लगे, तो भाषा का मौखिक हस्तांतरण कमजोर हो सकता है।
ऐसे में डिजिटल ऐप, ऑनलाइन प्लेटफॉर्म, AI और शैक्षणिक सामग्री आदिवासी भाषाओं को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़ने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। ‘आदि वाणी’ जैसे प्लेटफॉर्म इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास माने जा रहे हैं।
जनजातीय ज्ञान और परंपराओं के संरक्षण पर जोर
आदिवासी समुदायों के पास प्रकृति, जंगल, जैव विविधता, औषधीय पौधों और स्थानीय पर्यावरण से जुड़ा विशाल पारंपरिक ज्ञान मौजूद है। यह ज्ञान अक्सर स्थानीय भाषाओं, लोकगीतों और मौखिक परंपराओं के माध्यम से पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ता है।
इसलिए भाषाओं के संरक्षण को पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण से भी जोड़कर देखा जा रहा है। राष्ट्रीय सम्मेलन में इस बात पर चर्चा हुई कि भाषा संरक्षण के साथ सांस्कृतिक और ज्ञान परंपराओं का भी व्यवस्थित दस्तावेजीकरण किया जाना चाहिए।
क्यों महत्वपूर्ण है मैसूरु का यह राष्ट्रीय सम्मेलन?
मैसूरु में आयोजित यह सम्मेलन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भाषा, संस्कृति, संग्रहालय और तकनीक को एक साथ जोड़ने की कोशिश करता है। इसमें एक ओर भाषाओं के दस्तावेजीकरण पर जोर दिया गया, वहीं दूसरी ओर डिजिटल प्लेटफॉर्म और AI जैसी आधुनिक तकनीकों के उपयोग की दिशा में भी कदम उठाए गए।
जनजातीय कार्य मंत्रालय और CIIL के बीच सहयोग से आने वाले समय में आदिवासी भाषाओं पर व्यवस्थित शोध और डिजिटल कॉर्पस तैयार करने की प्रक्रिया को मजबूती मिल सकती है।
निष्कर्ष
कर्नाटक के मैसूरु में आयोजित राष्ट्रीय आदिवासी भाषा एवं संग्रहालय सम्मेलन भारत की भाषाई और सांस्कृतिक विविधता को संरक्षित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। ‘आदि वाणी’ के उन्नत संस्करण, पांच नई भाषाओं को जोड़ने, iOS ऐप लॉन्च करने, AI चैटबॉट Jago शुरू करने और CIIL के साथ MoU जैसे कदमों ने सम्मेलन को खास बनाया।
आदिवासी भाषाओं और संस्कृति का संरक्षण केवल अतीत को बचाने का प्रयास नहीं है, बल्कि भारत की विविध पहचान और पारंपरिक ज्ञान को भविष्य की पीढ़ियों तक पहुंचाने की जिम्मेदारी भी है।





