पोलैंड में आधी रात मचा सियासी घमासान, कोर्ट के बाहर पुलिस और प्रदर्शनकारी आमने-सामने; राष्ट्रपति ने बीच रास्ते से लौटाया विमान ???

Poland Protest News: यूरोपीय देश पोलैंड में 30 अक्टूबर की रात संवैधानिक संकट गहरा गया..

राजधानी वारसॉ में देश के संवैधानिक न्यायाधिकरण (Constitutional Tribunal) के बाहर भारी संख्या में पुलिस बल तैनात करना पड़ा। इसकी वजह न्यायाधिकरण के अध्यक्ष बोगदान श्विएचकोव्स्की (Bogdan Święczkowski) को एक महीने के लिए निलंबित किए जाने का फैसला था। इस कार्रवाई के विरोध में विपक्षी पार्टी लॉ एंड जस्टिस (PiS) के समर्थक सड़कों पर उतर आए। प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच तनाव बढ़ा और तीन लोगों को हिरासत में लिया गया।

AP News+2

इस घटनाक्रम ने पोलैंड की राजनीति में नया विवाद खड़ा कर दिया है। विपक्ष ने इसे संवैधानिक व्यवस्था पर हमला और तख्तापलट की कोशिश बताया है, जबकि प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क की सरकार का कहना है कि न्यायपालिका में कानून का शासन बहाल करने के लिए यह कदम उठाया गया है। मामला इतना गंभीर हो गया कि पोलैंड के राष्ट्रपति करोल नवरोत्स्की ने सेनेगल की अपनी यात्रा बीच में ही रोक दी और वापस वारसॉ लौट आए।

आधी रात को क्या हुआ था?

30 अक्टूबर की शाम पोलैंड के संवैधानिक न्यायाधिकरण की वेबसाइट पर एक सूचना सामने आई। इसमें बताया गया कि न्यायाधिकरण के अध्यक्ष बोगदान श्विएचकोव्स्की और उपाध्यक्ष बार्तलोमिएज सोचान्स्की को एक महीने के लिए उनके पद संबंधी जिम्मेदारियों से निलंबित कर दिया गया है।

यह फैसला न्यायाधीश अन्ना कोर्विन-पियोत्रोव्स्का ने घोषित किया। उन्होंने कहा कि वह न्यायाधिकरण की सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाली न्यायाधीश हैं और इस अवधि में संस्थान की जिम्मेदारी संभालेंगी।

इस घोषणा के बाद न्यायाधिकरण के बाहर तनाव बढ़ गया। विपक्षी लॉ एंड जस्टिस पार्टी के समर्थक और कई नेता वहां जमा हो गए। पुलिस ने पूरे परिसर के आसपास सुरक्षा बढ़ा दी। कुछ प्रदर्शनकारियों ने परिसर की बाड़ पार करने की कोशिश की और पुलिसकर्मियों पर वस्तुएं फेंकीं। पुलिस ने इस दौरान तीन लोगों को हिरासत में लिया।

The Guardian+2

राष्ट्रपति ने बीच रास्ते से क्यों लौटाया विमान?

इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ज्यादा चर्चा पोलैंड के राष्ट्रपति करोल नवरोत्स्की के फैसले की हुई। वह सरकारी यात्रा पर सेनेगल जा रहे थे, लेकिन संवैधानिक न्यायाधिकरण में पैदा हुए विवाद की जानकारी मिलने के बाद उन्होंने अपनी यात्रा बीच में ही रोक दी।

राष्ट्रपति ने सोशल मीडिया पर कहा कि ऐसे समय में राष्ट्रपति का पोलैंड में मौजूद रहना जरूरी है और इसलिए वह अपनी यात्रा समाप्त कर वापस लौट रहे हैं।

वारसॉ पहुंचने के बाद नवरोत्स्की न्यायाधिकरण परिसर में भी पहुंचे। उन्होंने सरकार समर्थित न्यायाधीशों की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए इसे देश की संवैधानिक व्यवस्था का उल्लंघन बताया। उनके मुताबिक, संवैधानिक संस्था पर जबरन कब्जा करने जैसी स्थिति पैदा की गई है।

The Guardian+2

बोगदान श्विएचकोव्स्की को क्यों हटाया गया?

पोलैंड में इस विवाद की जड़ न्यायपालिका की नियुक्तियों और संवैधानिक न्यायाधिकरण के नियंत्रण को लेकर लंबे समय से चल रही राजनीतिक खींचतान में है।

बोगदान श्विएचकोव्स्की को पिछली लॉ एंड जस्टिस (PiS) सरकार के कार्यकाल में न्यायाधिकरण का अध्यक्ष बनाया गया था। वह पूर्व में PiS सरकार में न्याय मंत्री भी रह चुके हैं। मौजूदा प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क की सरकार का आरोप है कि पिछली सरकार के दौरान न्यायपालिका में राजनीतिक हस्तक्षेप हुआ और संवैधानिक न्यायाधिकरण की स्वतंत्रता प्रभावित हुई।

मौजूदा संसद के बहुमत से चुने गए कुछ न्यायाधीशों को न्यायाधिकरण में काम करने का अवसर नहीं मिल पा रहा था। आरोप है कि श्विएचकोव्स्की ने इन न्यायाधीशों को अपना पद संभालने से रोक रखा था। इसी विवाद के बीच न्यायाधीश अन्ना कोर्विन-पियोत्रोव्स्का ने उनके निलंबन की घोषणा की।

दूसरी ओर, श्विएचकोव्स्की और विपक्षी नेताओं ने इस कार्रवाई की वैधता पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि न्यायाधिकरण के अध्यक्ष को इस तरह निलंबित करना कानूनी और संवैधानिक प्रक्रिया के खिलाफ है।

Reuters+2

आखिर तख्तापलट का दावा क्यों किया जा रहा है?

इस विवाद में ‘तख्तापलट’ शब्द सबसे ज्यादा चर्चा में है। दरअसल, न्यायाधिकरण के आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट और विपक्षी नेताओं ने मौजूदा घटनाक्रम को संवैधानिक व्यवस्था पर हमला बताया है।

PiS नेताओं का आरोप है कि सरकार न्यायपालिका पर नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश कर रही है। पार्टी के प्रमुख यारोस्लाव काचिंस्की ने भी इस कार्रवाई की आलोचना की। पूर्व न्याय मंत्री ज्बिग्न्यू जियोब्रो ने इसे संवैधानिक व्यवस्था पर आपराधिक हमला बताते हुए विरोध का आह्वान किया।

हालांकि, यह समझना जरूरी है कि तख्तापलट का दावा विपक्ष और विवाद से जुड़े पक्षों का आरोप है। अभी तक इस घटनाक्रम को सैन्य तख्तापलट के रूप में स्थापित करने वाला कोई प्रमाण सामने नहीं आया है। असल विवाद न्यायाधिकरण के नेतृत्व, न्यायाधीशों की नियुक्ति और उनके अधिकारों को लेकर है।

AP News+2

प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क की सरकार का क्या कहना है?

प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क की सरकार ने इस कार्रवाई को न्यायपालिका में कानून का शासन बहाल करने की दिशा में जरूरी कदम बताया है। सरकार का तर्क है कि पिछली PiS सरकार के दौरान न्यायिक संस्थाओं में किए गए बदलावों ने उनकी स्वतंत्रता को प्रभावित किया था।

टस्क सरकार का कहना है कि मौजूदा संसद द्वारा चुने गए न्यायाधीशों को उनके संवैधानिक अधिकारों के अनुसार काम करने का अवसर मिलना चाहिए। सरकार न्यायिक व्यवस्था में सुधार के अपने प्रयासों को लोकतांत्रिक संस्थाओं की बहाली से जोड़कर देखती है।

दूसरी ओर, राष्ट्रपति नवरोत्स्की और PiS का मानना है कि सरकार की कार्रवाई न्यायपालिका की स्वतंत्रता के बजाय राजनीतिक नियंत्रण की कोशिश है। इस तरह दोनों पक्ष एक-दूसरे पर संवैधानिक व्यवस्था को कमजोर करने के आरोप लगा रहे हैं।

DWAMP+2

2015 से चल रहा है न्यायपालिका का विवाद

पोलैंड में संवैधानिक न्यायाधिकरण को लेकर विवाद कोई नया नहीं है। इसकी शुरुआत वर्ष 2015 में हुई थी, जब तत्कालीन और नई सरकारों के बीच न्यायाधीशों की नियुक्तियों को लेकर टकराव हुआ।

उस समय लॉ एंड जस्टिस पार्टी सत्ता में आई थी। इसके बाद न्यायाधिकरण में न्यायाधीशों की नियुक्ति और उनके अधिकारों को लेकर विवाद शुरू हुआ। यूरोपीय संघ ने भी पोलैंड की न्यायिक व्यवस्था में किए गए बदलावों पर सवाल उठाए थे।

यूरोपीय संस्थाओं की चिंता थी कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता प्रभावित हो रही है। वहीं PiS का पक्ष रहा कि न्यायिक व्यवस्था में बदलाव जरूरी थे। वर्ष 2023 में डोनाल्ड टस्क के नेतृत्व में नई सरकार बनने के बाद न्यायिक सुधारों को लेकर फिर से प्रयास शुरू हुए। लेकिन राष्ट्रपति और सरकार के बीच मतभेदों के कारण कई फैसलों पर सहमति नहीं बन सकी।

Reuters+2

क्या आगे और बढ़ सकता है राजनीतिक टकराव?

पोलैंड में मौजूदा घटनाक्रम ने सरकार, राष्ट्रपति और विपक्ष के बीच पहले से मौजूद तनाव को और बढ़ा दिया है। एक तरफ सरकार न्यायिक संस्थाओं में सुधार की बात कर रही है, तो दूसरी तरफ विपक्ष इसे संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन बता रहा है।

पुलिस की तैनाती, प्रदर्शनकारियों की गिरफ्तारी और राष्ट्रपति का विदेश दौरा बीच में रोककर लौटना इस विवाद की गंभीरता को दिखाता है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि न्यायाधिकरण के नेतृत्व को लेकर कानूनी स्थिति क्या बनती है और क्या दोनों पक्ष किसी सहमति तक पहुंच पाते हैं।

फिलहाल पोलैंड की सड़कों पर हुए प्रदर्शन और संवैधानिक न्यायाधिकरण के भीतर पैदा हुआ विवाद देश की राजनीति के लिए बड़ी चुनौती बन गया है। इस पूरे मामले का समाधान अदालतों, संवैधानिक प्रक्रियाओं और राजनीतिक सहमति के जरिए ही निकल सकता है।

Back to top button