उत्तराखंड में छह साल बाद शुरू हुआ हाथियों की गणना अभियान, वन्यजीव संरक्षण को मिलेगी नई दिशा

देहरादून, 20 मई 2026। उत्तराखंड में हाथियों की वास्तविक संख्या का पता लगाने और उनके संरक्षण को और प्रभावी बनाने के उद्देश्य से राज्यव्यापी हाथी गणना अभियान शुरू किया गया है। करीब छह वर्षों के लंबे अंतराल के बाद वन विभाग प्रत्यक्ष गणना पद्धति (Direct Count Method) के माध्यम से हाथियों की संख्या का आकलन कर रहा है। इस महत्वपूर्ण अभियान में उत्तराखंड वन विभाग के साथ-साथ भारतीय वन्यजीव संस्थान (Wildlife Institute of India) भी सक्रिय रूप से सहयोग कर रहा है।

उत्तराखंड देश के उन प्रमुख राज्यों में शामिल है जहां एशियाई हाथियों की बड़ी आबादी निवास करती है। राज्य के राजाजी टाइगर रिजर्व, कॉर्बेट टाइगर रिजर्व, तराई पूर्वी वन प्रभाग, तराई पश्चिमी वन प्रभाग, हल्द्वानी वन क्षेत्र और कई अन्य जंगल हाथियों के प्रमुख आवास माने जाते हैं। ऐसे में हाथियों की सटीक संख्या और उनके आवासीय क्षेत्रों की जानकारी जुटाना वन्यजीव संरक्षण की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

छह साल बाद क्यों जरूरी हुई गणना?

विशेषज्ञों के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में उत्तराखंड के जंगलों में तेजी से बदलाव देखने को मिला है। मानव बस्तियों का विस्तार, सड़क और रेल परियोजनाएं, जंगलों में बढ़ती गतिविधियां तथा जलवायु परिवर्तन जैसे कारकों का असर वन्यजीवों पर पड़ा है। इन परिस्थितियों में हाथियों की वर्तमान स्थिति और उनकी आबादी का वैज्ञानिक मूल्यांकन आवश्यक हो गया था।

वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि पिछली गणना के बाद हाथियों के आवागमन के मार्गों, उनके व्यवहार और आवासीय क्षेत्रों में कई बदलाव आए हैं। इसलिए नई गणना से प्राप्त आंकड़े भविष्य की संरक्षण योजनाओं को तैयार करने में मदद करेंगे।

क्या है डायरेक्ट काउंट मेथड?

इस बार हाथियों की गणना के लिए प्रत्यक्ष गणना पद्धति यानी डायरेक्ट काउंट मेथड अपनाई जा रही है। इस पद्धति के तहत वन कर्मियों और विशेषज्ञों की टीमें विभिन्न वन क्षेत्रों में जाकर हाथियों को प्रत्यक्ष रूप से चिन्हित करती हैं और उनकी संख्या दर्ज करती हैं।

गणना के दौरान हाथियों के झुंड, उनकी आयु, नर और मादा हाथियों की संख्या तथा बच्चों की मौजूदगी जैसी जानकारियां भी एकत्र की जाती हैं। इसके लिए जंगलों में कई अवलोकन बिंदु बनाए गए हैं, जहां से विशेषज्ञ दूरबीन और आधुनिक उपकरणों की मदद से निगरानी कर रहे हैं।

वन विभाग का मानना है कि यह पद्धति हाथियों की वास्तविक संख्या का अपेक्षाकृत अधिक सटीक अनुमान उपलब्ध कराती है।

सैकड़ों कर्मचारी और विशेषज्ञ जुटे

राज्यव्यापी इस अभियान में वन विभाग के सैकड़ों अधिकारी, वन रक्षक, वन दरोगा, शोधकर्ता और स्वयंसेवक भाग ले रहे हैं। भारतीय वन्यजीव संस्थान के वैज्ञानिक भी तकनीकी सहायता प्रदान कर रहे हैं।

अभियान को सफल बनाने के लिए विभिन्न टीमों का गठन किया गया है, जिन्हें अलग-अलग वन क्षेत्रों में तैनात किया गया है। इन टीमों को GPS उपकरण, डिजिटल मैप, कैमरा ट्रैप और अन्य आधुनिक संसाधन उपलब्ध कराए गए हैं ताकि आंकड़ों को अधिक सटीकता के साथ एकत्र किया जा सके।

हाथियों के संरक्षण में मिलेगी मदद

विशेषज्ञों का मानना है कि हाथियों की सटीक संख्या का पता चलने से संरक्षण संबंधी योजनाओं को नई दिशा मिलेगी। यदि किसी क्षेत्र में हाथियों की संख्या अपेक्षा से अधिक पाई जाती है तो वहां अतिरिक्त सुरक्षा उपाय किए जा सकेंगे। वहीं जिन क्षेत्रों में संख्या कम होगी, वहां विशेष संरक्षण कार्यक्रम शुरू किए जा सकते हैं।

इसके अलावा हाथियों के प्रवास मार्गों (Elephant Corridors) की पहचान और संरक्षण में भी यह सर्वे महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। हाथियों के लिए सुरक्षित आवागमन मार्ग सुनिश्चित करना वन्यजीव संरक्षण की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक माना जाता है।

मानव-हाथी संघर्ष पर भी रहेगा फोकस

उत्तराखंड में पिछले कुछ वर्षों के दौरान मानव-हाथी संघर्ष की घटनाएं बढ़ी हैं। कई बार हाथियों के झुंड भोजन की तलाश में गांवों और खेतों तक पहुंच जाते हैं, जिससे फसलों को नुकसान होता है और जनहानि की घटनाएं भी सामने आती हैं।

वन विभाग का मानना है कि नई गणना से हाथियों के आवासीय क्षेत्रों और उनकी गतिविधियों की बेहतर जानकारी मिलेगी। इससे मानव-हाथी संघर्ष को कम करने के लिए प्रभावी रणनीति बनाई जा सकेगी।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि हाथियों के नियमित मार्गों की सही पहचान हो जाए तो वहां सुरक्षा अवरोध, चेतावनी प्रणाली और वैकल्पिक रास्तों की व्यवस्था की जा सकती है।

जैव विविधता के लिए महत्वपूर्ण हैं हाथी

हाथियों को जंगल का “कीस्टोन स्पीशीज़” माना जाता है। वे जंगलों के पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हाथी बीजों के प्रसार में मदद करते हैं, जंगलों में प्राकृतिक रास्ते बनाते हैं और कई अन्य जीवों के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करते हैं।

वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार यदि किसी क्षेत्र में हाथियों की आबादी स्वस्थ और स्थिर है, तो यह उस पूरे पारिस्थितिकी तंत्र की अच्छी स्थिति का संकेत माना जाता है।

आधुनिक तकनीक का भी होगा उपयोग

हालांकि मुख्य गणना प्रत्यक्ष अवलोकन के आधार पर की जा रही है, लेकिन इसके साथ कैमरा ट्रैप, GPS ट्रैकिंग और डिजिटल डेटा संग्रहण तकनीकों का भी उपयोग किया जा रहा है। इससे प्राप्त जानकारी को वैज्ञानिक तरीके से विश्लेषित किया जाएगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक तकनीक और पारंपरिक सर्वेक्षण विधियों के संयोजन से अधिक विश्वसनीय आंकड़े प्राप्त होंगे।

सरकार और वन विभाग की उम्मीदें

राज्य सरकार और वन विभाग को उम्मीद है कि यह अभियान उत्तराखंड में वन्यजीव संरक्षण को नई मजबूती देगा। सर्वेक्षण के नतीजों के आधार पर भविष्य में हाथियों के संरक्षण, उनके आवास विकास और मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए नई योजनाएं तैयार की जाएंगी।

वन अधिकारियों के अनुसार अभियान से प्राप्त आंकड़े राष्ट्रीय स्तर पर भी महत्वपूर्ण साबित होंगे और देश में एशियाई हाथियों के संरक्षण से जुड़ी नीतियों को बेहतर बनाने में मदद करेंगे।

निष्कर्ष

उत्तराखंड में शुरू हुआ हाथी गणना अभियान केवल एक सर्वेक्षण नहीं बल्कि वन्यजीव संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। छह साल बाद हो रही यह गणना राज्य में हाथियों की वास्तविक स्थिति का स्पष्ट चित्र प्रस्तुत करेगी। साथ ही इससे संरक्षण योजनाओं को मजबूत आधार मिलेगा और मानव-हाथी संघर्ष जैसी चुनौतियों से निपटने में भी सहायता मिलेगी। विशेषज्ञों को उम्मीद है कि इस अभियान के परिणाम भविष्य में उत्तराखंड की समृद्ध जैव विविधता और वन्यजीव संरक्षण प्रयासों को नई दिशा देंगे।

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