कैंसर और टिटनेस के इलाज पर बढ़ा बोझ, कई जरूरी दवाएं हुईं 50% तक महंगी; जानिए वजह और असर
कैंसर और टिटनेस की दवाएं हुईं महंगी, कीमतों में 50% तक बढ़ोतरी
कैंसर और टिटनेस की कई दवाओं की कीमतों में 50% तक बढ़ोतरी हुई है। जानिए इसके पीछे की वजह और मरीजों पर इसका असर।
नई दिल्ली:
देश में गंभीर बीमारियों के इलाज का खर्च एक बार फिर बढ़ गया है। कैंसर और टिटनेस जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली कई आवश्यक दवाओं की कीमतों में 50 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी की गई है। इस फैसले का सीधा असर उन लाखों मरीजों पर पड़ेगा, जो पहले से ही महंगे इलाज और दवाओं का खर्च उठाने में कठिनाई महसूस कर रहे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि कैंसर जैसी बीमारी में इलाज कई महीनों या वर्षों तक चलता है। ऐसे में दवाओं की कीमत बढ़ने से मरीजों और उनके परिवारों पर आर्थिक दबाव और अधिक बढ़ सकता है।
किन दवाओं की कीमतें बढ़ीं?
जानकारी के अनुसार, कैंसर के उपचार में इस्तेमाल होने वाली कुछ महत्वपूर्ण दवाओं के साथ-साथ टिटनेस के इलाज और रोकथाम में उपयोग होने वाली चुनिंदा दवाओं एवं इंजेक्शनों की कीमतों में बढ़ोतरी की गई है। कुछ उत्पादों की कीमतों में लगभग 50 प्रतिशत तक का इजाफा देखा गया है।
हालांकि, सभी कैंसर या टिटनेस की दवाएं इस बढ़ोतरी के दायरे में नहीं हैं। अलग-अलग दवाओं में मूल्य वृद्धि का प्रतिशत अलग हो सकता है।
क्यों बढ़ाई गई दवाओं की कीमत?
दवा कंपनियों और उद्योग से जुड़े सूत्रों के अनुसार, कीमत बढ़ाने के पीछे कई प्रमुख कारण बताए जा रहे हैं—
- कच्चे माल (API) की बढ़ती लागत।
- आयातित रसायनों और दवा सामग्री की महंगाई।
- उत्पादन और पैकेजिंग खर्च में वृद्धि।
- परिवहन एवं लॉजिस्टिक्स लागत बढ़ना।
- वैश्विक सप्लाई चेन में आने वाली चुनौतियां।
इन कारणों से दवा निर्माण की लागत बढ़ी है, जिसके चलते कुछ दवाओं के दाम संशोधित किए गए हैं।
मरीजों पर क्या होगा असर?
कैंसर का इलाज पहले से ही देश के सबसे महंगे चिकित्सा उपचारों में गिना जाता है। ऐसे में दवाओं की कीमत बढ़ने से मरीजों को हर महीने हजारों रुपये अतिरिक्त खर्च करने पड़ सकते हैं।
विशेष रूप से निम्न और मध्यम आय वर्ग के परिवारों के लिए यह फैसला आर्थिक रूप से चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है। कई मरीज पहले ही इलाज अधूरा छोड़ने को मजबूर हो जाते हैं और अब बढ़ी हुई दवा कीमतें उनकी मुश्किलें और बढ़ा सकती हैं।
डॉक्टरों की क्या सलाह है?
विशेषज्ञों का कहना है कि मरीज बिना डॉक्टर की सलाह के दवा बंद न करें और न ही खुराक में कोई बदलाव करें। यदि किसी दवा की कीमत अधिक हो गई है तो डॉक्टर से उसका जेनेरिक या कम कीमत वाला वैकल्पिक विकल्प उपलब्ध होने की जानकारी ली जा सकती है।
सरकार की भूमिका पर भी उठे सवाल
स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि जीवनरक्षक दवाओं की कीमतों को आम लोगों की पहुंच में बनाए रखना बेहद जरूरी है। ऐसे में सरकार और संबंधित एजेंसियों से उम्मीद की जा रही है कि मरीजों पर आर्थिक बोझ कम करने के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएंगे।
क्या करें मरीज?
- डॉक्टर की सलाह के बिना दवा बंद न करें।
- जेनेरिक दवा उपलब्ध हो तो उसके बारे में जानकारी लें।
- सरकारी अस्पतालों और जन औषधि केंद्रों पर उपलब्ध विकल्पों की जांच करें।
- दवा खरीदते समय अधिकृत मेडिकल स्टोर से ही खरीदारी करें।





