तृणमूल कांग्रेस (TMC) में आई बगावत ने Mamata Banerjee के सामने अब तक की सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती खड़ी कर दी है। रिपोर्टों के अनुसार 80 में से 58 विधायक बागी खेमे के साथ खड़े हो गए हैं और Ritabrata Banerjee को विधानसभा में विपक्ष का नेता (LoP) मान्यता भी मिल चुकी है।
TMC में बगावत से ममता बनर्जी संकट में, क्या बच पाएगी पार्टी?
ममता बनर्जी के सामने सबसे बड़े विकल्प क्या हैं?
1. पार्टी पर नैतिक और भावनात्मक पकड़ मजबूत करना
बागी गुट अभी भी पूरी तरह ममता विरोधी नहीं दिख रहा। कुछ विधायक उन्हें पार्टी की “चेयरपर्सन” या मार्गदर्शक भूमिका में बनाए रखने की बात कर रहे हैं। इसका मतलब है कि ममता अभी भी पार्टी कार्यकर्ताओं और वोटरों के बड़े हिस्से पर प्रभाव रखती हैं।
2. कानूनी लड़ाई
TMC नेतृत्व विधानसभा अध्यक्ष के फैसले को अदालत में चुनौती दे सकता है। पार्टी यह तर्क दे रही है कि निष्कासित विधायक को विपक्ष का नेता नहीं बनाया जा सकता। यदि अदालत से राहत मिलती है तो बागी गुट की स्थिति कमजोर हो सकती है।
3. संगठन का पुनर्गठन
पार्टी पहले ही कई संगठनात्मक समितियों को भंग करने जैसे कदम उठा चुकी है। ममता नए जिलाध्यक्ष, ब्लॉक अध्यक्ष और युवा नेतृत्व को आगे लाकर संगठन को फिर से खड़ा करने की कोशिश कर सकती हैं।
4. अभिषेक बनर्जी की भूमिका पर पुनर्विचार
बागी नेताओं ने खुलकर आरोप लगाया है कि पार्टी के भीतर आलोचना की गुंजाइश नहीं थी और Abhishek Banerjee को लेकर असंतोष बढ़ा। यदि ममता पार्टी को बचाना चाहती हैं तो उन्हें नेतृत्व संरचना में बदलाव या शक्ति का पुनर्वितरण करना पड़ सकता है।
5. जमीनी कार्यकर्ताओं को सक्रिय करना
विधायक टूट सकते हैं, लेकिन चुनाव जिताने में बूथ स्तर का संगठन निर्णायक होता है। यदि ममता कार्यकर्ताओं और पुराने समर्थकों को अपने साथ बनाए रखती हैं, तो वह नई पार्टी या नए गुट के खिलाफ राजनीतिक लड़ाई लड़ सकती हैं।
सबसे बड़ा खतरा क्या है?
राजनीतिक विश्लेषक इस संकट की तुलना 2022 में Eknath Shinde द्वारा Uddhav Thackeray की Shiv Sena में कराए गए विभाजन से कर रहे हैं। यदि बागी गुट दो-तिहाई समर्थन बनाए रखता है तो वह खुद को “असली TMC” बताने की कोशिश कर सकता है, जिससे पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह पर भी विवाद खड़ा हो सकता है।
निष्कर्ष

ममता बनर्जी की राजनीति अभी खत्म नहीं हुई है, क्योंकि उनके पास जनाधार, पहचान और संगठनात्मक अनुभव है। लेकिन यदि वे बागियों से समझौता, संगठन सुधार और नेतृत्व में बदलाव जैसे कदम नहीं उठातीं, तो TMC का संकट और गहरा सकता है। फिलहाल यह लड़ाई केवल विधायकों की संख्या की नहीं, बल्कि “असली TMC” की पहचान की बन गई है।





