6.6 करोड़ साल पुराने ‘डायनासोर किलर’ उल्कापिंड का मिला सुराग! वैज्ञानिकों ने किया चौंकाने वाला खुलासा
6.6 करोड़ साल पुराने डायनासोर खत्म करने वाले उल्कापिंड का मिला सुराग, वैज्ञानिकों का बड़ा खुलासा
वैज्ञानिकों ने 6.6 करोड़ साल पहले डायनासोरों के विनाश का कारण बने दुर्लभ उल्कापिंड के अवशेषों की पहचान की है। जानिए पूरी रिसर्च और इसका महत्व।
पृथ्वी से डायनासोरों के अस्तित्व को खत्म करने वाले विनाशकारी उल्कापिंड को लेकर वैज्ञानिकों ने एक बड़ी खोज की है। शोधकर्ताओं ने 6.6 करोड़ वर्ष पुराने उस दुर्लभ उल्कापिंड के अवशेषों की पहचान की है, जिसने पृथ्वी के इतिहास की सबसे बड़ी सामूहिक विलुप्ति (Mass Extinction) की घटना को जन्म दिया था। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह खोज न केवल डायनासोरों के अंत की गुत्थी सुलझाने में मदद करेगी, बल्कि यह भी बताएगी कि सौरमंडल में घूमने वाले विशाल एस्टेरॉयड कैसे ग्रहों के भविष्य को बदल सकते हैं।
6.6 करोड़ साल पहले क्या हुआ था?
करीब 6.6 करोड़ वर्ष पहले लगभग 10 किलोमीटर चौड़ा एक विशाल एस्टेरॉयड पृथ्वी से टकराया था। यह टक्कर आज के मेक्सिको के युकातान प्रायद्वीप (Yucatán Peninsula) स्थित चिक्सुलुब (Chicxulub) क्षेत्र में हुई थी। इस प्रभाव से इतना भीषण विस्फोट हुआ कि वातावरण में धूल, राख और गैसों का विशाल गुबार फैल गया। सूर्य की रोशनी लंबे समय तक पृथ्वी तक नहीं पहुंच सकी, तापमान में भारी गिरावट आई और भोजन श्रृंखला पूरी तरह टूट गई।
वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इस आपदा में पृथ्वी पर मौजूद लगभग 75 प्रतिशत जीव-जंतु और पौधों की प्रजातियां समाप्त हो गई थीं। इन्हीं में गैर-पक्षी डायनासोर भी शामिल थे।
आखिर क्या मिला है वैज्ञानिकों को?
हालिया अध्ययन में वैज्ञानिकों ने ऐसे उल्कापिंडीय पदार्थों (Meteorite Fragments) का विश्लेषण किया है, जिनकी रासायनिक संरचना उस विशाल एस्टेरॉयड से मेल खाती है जिसने चिक्सुलुब क्रेटर बनाया था। शोध के अनुसार, पृथ्वी पर अब तक मिले अधिकांश उल्कापिंडों की तुलना में इस प्रकार के एस्टेरॉयड बेहद दुर्लभ हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि पृथ्वी पर मिलने वाले सभी एस्टेरॉयड नमूनों में ऐसे उल्कापिंडों की हिस्सेदारी केवल लगभग 5 प्रतिशत है। इससे संकेत मिलता है कि डायनासोरों के विनाश का कारण बना एस्टेरॉयड सामान्य अंतरिक्ष चट्टानों से अलग और अत्यंत दुर्लभ श्रेणी का था।
क्यों खास है यह खोज?
वैज्ञानिकों के अनुसार यह खोज कई अहम सवालों के जवाब दे सकती है—
- डायनासोरों के विनाश का वास्तविक कारण क्या था?
- एस्टेरॉयड किस क्षेत्र से आया था?
- भविष्य में पृथ्वी के लिए ऐसे खतरनाक पिंडों की पहचान कैसे की जाए?
- सौरमंडल के शुरुआती विकास को बेहतर ढंग से कैसे समझा जाए?
शोधकर्ताओं का मानना है कि उल्कापिंड की संरचना का अध्ययन भविष्य में ग्रह सुरक्षा (Planetary Defense) कार्यक्रमों को भी मजबूत बनाने में मदद करेगा।
पृथ्वी पर पड़ा था वैश्विक असर
विशाल एस्टेरॉयड के टकराने से उत्पन्न ऊर्जा अरबों परमाणु बमों के बराबर मानी जाती है। इसके कारण भीषण जंगलों में आग लगी, सुनामी आई और वातावरण में सल्फर व धूल की मोटी परत छा गई। इसके बाद पृथ्वी पर लंबे समय तक जलवायु परिवर्तन हुआ, जिससे अधिकांश जीवित प्रजातियां जीवित नहीं रह सकीं।
हालांकि, इसी महाविलुप्ति के बाद स्तनधारी जीवों के विकास को गति मिली और करोड़ों वर्षों बाद मानव सभ्यता का उदय संभव हो सका।
भविष्य के लिए भी अहम है शोध
आज दुनिया भर की अंतरिक्ष एजेंसियां पृथ्वी के निकट आने वाले एस्टेरॉयड (Near-Earth Objects) पर लगातार नजर रख रही हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि अतीत की ऐसी घटनाओं को समझना भविष्य में संभावित अंतरिक्षीय खतरों से पृथ्वी की रक्षा के लिए बेहद जरूरी है।
नई खोज इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है, क्योंकि इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि दुर्लभ प्रकार के एस्टेरॉयड पृथ्वी जैसे ग्रहों को किस तरह प्रभावित कर सकते हैं।





