सऊदी अरब के साथ ट्रंप की 30 साल की न्यूक्लियर डील को मंजूरी, जानिए समझौते में क्या-क्या शामिल?
ट्रंप ने सऊदी अरब के साथ 30 साल की न्यूक्लियर डील को दी मंजूरी, यूरेनियम एनरिचमेंट पर दुनिया की नजर
नई दिल्ली: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सऊदी अरब के साथ एक ऐतिहासिक 30 वर्षीय असैन्य (Civil Nuclear) परमाणु सहयोग समझौते को मंजूरी दे दी है। इस समझौते के तहत अमेरिका सऊदी अरब के नागरिक परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के विकास में सहयोग करेगा। हालांकि, सबसे अधिक चर्चा उस प्रावधान को लेकर है जिसमें भविष्य में सऊदी अरब में यूरेनियम एनरिचमेंट (Uranium Enrichment) प्लांट स्थापित करने की संभावना भी शामिल है।
यह समझौता अभी अमेरिकी कांग्रेस की समीक्षा प्रक्रिया से भी गुजरेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह मध्य-पूर्व की सामरिक राजनीति और वैश्विक परमाणु सुरक्षा के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।
क्या है इस 30 साल की न्यूक्लियर डील?
यह समझौता अमेरिकी परमाणु ऊर्जा अधिनियम की “123 Agreement” व्यवस्था के तहत तैयार किया गया है। इसके जरिए अमेरिकी कंपनियां सऊदी अरब में परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के निर्माण, तकनीक हस्तांतरण और प्रशिक्षण में भाग ले सकेंगी। समझौते की अवधि 30 वर्ष होगी।
समझौते की प्रमुख बातें
- सऊदी अरब को शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम विकसित करने में अमेरिकी सहयोग मिलेगा।
- अमेरिकी कंपनियां परमाणु रिएक्टरों के निर्माण और संचालन में भाग लेंगी।
- परमाणु ईंधन चक्र और तकनीकी सहयोग के लिए दोनों देशों के बीच दीर्घकालिक साझेदारी बनेगी।
- सऊदी अरब में यूरेनियम एनरिचमेंट प्लांट की संभावना रखी गई है, लेकिन इसके लिए पहले अमेरिका और सऊदी अरब की संयुक्त तकनीकी समीक्षा आवश्यक होगी।
- समझौता 30 वर्षों तक प्रभावी रहेगा।
यूरेनियम एनरिचमेंट क्यों है सबसे बड़ा मुद्दा?
यूरेनियम एनरिचमेंट का उपयोग परमाणु बिजली उत्पादन के लिए किया जाता है, लेकिन यही तकनीक अत्यधिक स्तर पर परमाणु हथियार बनाने में भी इस्तेमाल हो सकती है। इसी कारण इस प्रावधान को लेकर अमेरिका सहित कई देशों के सांसद और परमाणु अप्रसार विशेषज्ञ चिंता जता रहे हैं।
IAEA निगरानी को लेकर भी उठे सवाल
रिपोर्टों के अनुसार इस समझौते में IAEA के Additional Protocol को शामिल नहीं किया गया है। यह प्रोटोकॉल अंतरराष्ट्रीय परमाणु निरीक्षण को अधिक व्यापक और सख्त बनाता है। इसके अभाव में परमाणु गतिविधियों की निगरानी को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
कांग्रेस में हो सकता है विरोध
अमेरिकी कानून के अनुसार यह समझौता अब कांग्रेस के समक्ष जाएगा, जहां इसकी समीक्षा होगी। यदि पर्याप्त समर्थन मिला तो समझौता लागू होगा, लेकिन कई सांसद पहले ही इसे लेकर सुरक्षा और परमाणु प्रसार संबंधी चिंताएं जता चुके हैं।
मध्य-पूर्व की राजनीति पर असर
विशेषज्ञों का मानना है कि यह समझौता सऊदी अरब की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करेगा, लेकिन साथ ही ईरान, इजरायल और अन्य क्षेत्रीय देशों के बीच सामरिक संतुलन पर भी असर डाल सकता है। यदि सऊदी अरब को यूरेनियम संवर्धन की अनुमति मिलती है तो क्षेत्र में परमाणु प्रतिस्पर्धा बढ़ने की आशंका भी जताई जा रही है।





