चीन की झेजियांग यूनिवर्सिटी की NeuroImage स्टडी में सामने आया कि लगातार पसंदीदा शॉर्ट वीडियो देखने पर दिमाग के कॉग्निटिव कंट्रोल नेटवर्क में बदलाव दिख सकते हैं???

रील्स और शॉर्ट वीडियो स्क्रॉल करते रहने से दिमाग में क्या होता है? साइंस जर्नल में छपी चीन की नई स्टडी ने दिया जवाब....

Reels Dekhne Se Kya Hota Hai: watching reels and shorts may make certain parts of the brain less active study reveals the impact | Times Now Navbharat

Reel Scrolling Effects: लगातार रील्स और शॉर्ट वीडियो देखने से दिमाग के कुछ अहम हिस्सों की गतिविधि दब सकती है, नई NeuroImage स्टडी में सामने आई दिलचस्प जानकारी

आज के समय में Instagram Reels, YouTube Shorts और TikTok जैसे शॉर्ट वीडियो प्लेटफॉर्म लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का बड़ा हिस्सा बन चुके हैं। कई बार लोग कुछ मिनट के लिए फोन उठाते हैं, लेकिन लगातार वीडियो स्क्रॉल करते-करते घंटों बीत जाते हैं। अब चीन की झेजियांग यूनिवर्सिटी से जुड़े शोधकर्ताओं की एक नई स्टडी ने यह समझने की कोशिश की है कि पसंदीदा शॉर्ट वीडियो लगातार देखने के दौरान दिमाग के अंदर क्या बदलाव होते हैं।

यह अध्ययन प्रतिष्ठित साइंस जर्नल NeuroImage में प्रकाशित हुआ है। शोध में पाया गया कि शॉर्ट वीडियो देखने के दौरान दिमाग के कॉग्निटिव कंट्रोल, यानी ध्यान नियंत्रित करने, निर्णय लेने और व्यवहार पर नियंत्रण रखने से जुड़े कुछ हिस्सों की गतिविधि कम हो सकती है। हालांकि वैज्ञानिकों का कहना है कि इस शोध को सीधे तौर पर हर व्यक्ति के लिए “रील्स देखने से दिमाग खराब हो जाता है” जैसे निष्कर्ष के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

Reels Dekhne Se Kya Hota Hai: watching reels and shorts may make certain parts of the brain less active study reveals the impact | Times Now Navbharat

कौन-कौन से हिस्सों पर हुई स्टडी?

शोधकर्ताओं ने खास तौर पर दिमाग के दो महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर ध्यान दिया—

  • Dorsal Anterior Cingulate Cortex (dACC)
  • Dorsolateral Prefrontal Cortex (dlPFC)

ये दोनों हिस्से व्यापक रूप से ध्यान, लक्ष्य पर टिके रहने, निर्णय लेने, मानसिक नियंत्रण और आत्म-नियंत्रण जैसी प्रक्रियाओं से जुड़े माने जाते हैं।

NeuroImage में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, जब प्रतिभागी अपनी पसंद के शॉर्ट वीडियो देख रहे थे, तब इन कॉग्निटिव कंट्रोल क्षेत्रों में गतिविधि में कमी देखी गई। शोध के मुख्य निष्कर्षों में dACC और dlPFC का “deactivation” शामिल है।

आखिर क्यों स्क्रॉल करते रह जाते हैं लोग?

शॉर्ट वीडियो का फॉर्मेट बेहद तेज और लगातार बदलने वाला होता है। कुछ सेकंड में नया कंटेंट सामने आ जाता है और हर अगला वीडियो पहले से ज्यादा दिलचस्प हो सकता है। ऐसे में दिमाग को लगातार नए दृश्य, आवाज और जानकारी मिलती रहती है।

स्टडी के मुताबिक, मनोरंजन और तत्काल संतुष्टि देने वाला शॉर्ट वीडियो अनुभव कुछ परिस्थितियों में न्यूरल प्रोसेसिंग को तत्काल भावनात्मक जुड़ाव और त्वरित संतुष्टि की ओर मोड़ सकता है। यही वजह है कि कुछ लोगों के लिए “बस एक और वीडियो” देखते-देखते लंबे समय तक स्क्रॉलिंग जारी रह सकती है।

ग्लूटामेट की भूमिका भी सामने आई

इस शोध में दिमाग के एक महत्वपूर्ण न्यूरोकेमिकल ग्लूटामेट पर भी ध्यान दिया गया। शोधकर्ताओं ने पाया कि आराम की स्थिति में dACC से जुड़े ग्लूटामेट स्तर और शॉर्ट वीडियो देखने के दौरान dACC गतिविधि में होने वाले बदलावों के बीच संबंध था।

अध्ययन ने यह भी संकेत दिया कि दिमाग की रसायन संबंधी व्यक्तिगत भिन्नताएं यह समझने में मदद कर सकती हैं कि कुछ लोग अत्यधिक शॉर्ट वीडियो उपयोग के प्रति दूसरों की तुलना में ज्यादा संवेदनशील क्यों हो सकते हैं।

ध्यान और एकाग्रता पर पड़ सकता है असर?

यही शोध समूह पहले भी शॉर्ट वीडियो उपयोग और ध्यान से जुड़े प्रभावों का अध्ययन कर चुका है। 2024 में प्रकाशित एक EEG अध्ययन में शोधकर्ताओं ने बताया था कि मोबाइल पर शॉर्ट वीडियो का अत्यधिक उपयोग ध्यान संबंधी कार्यों पर नकारात्मक प्रभाव से जुड़ा पाया गया।

इसका मतलब यह नहीं कि हर रील देखने वाला व्यक्ति ध्यान की समस्या से जूझने लगेगा, लेकिन बहुत ज्यादा और अनियंत्रित शॉर्ट वीडियो उपयोग को लेकर वैज्ञानिक चिंता जरूर जताते रहे हैं।

क्या यह शॉर्ट वीडियो एडिक्शन का सबूत है?

नई स्टडी को सीधे “रील्स एडिक्शन” का अंतिम प्रमाण नहीं कहा जा सकता। शोध मुख्य रूप से यह समझने पर केंद्रित है कि पसंदीदा शॉर्ट वीडियो देखने के दौरान दिमाग की गतिविधि और न्यूरोकेमिकल कारकों में किस तरह के संबंध दिखाई देते हैं।

वैज्ञानिक शोधों में “समस्या पैदा करने वाला उपयोग” और “सामान्य उपयोग” के बीच अंतर करना महत्वपूर्ण होता है। किसी व्यक्ति का कुछ समय रील्स देखना अपने आप में बीमारी या लत साबित नहीं करता।

लेकिन अगर कोई व्यक्ति—

  • जरूरी काम छोड़कर लगातार स्क्रॉल करता रहे,
  • फोन बंद करने में बार-बार असफल हो,
  • पढ़ाई या काम पर ध्यान न लगा पाए,
  • नींद प्रभावित होने लगे,
  • सोशल मीडिया उपयोग को नियंत्रित न कर पाए,

तो यह उसके डिजिटल उपयोग की आदतों पर ध्यान देने का संकेत हो सकता है।

लगातार स्क्रॉलिंग क्यों बन सकती है आदत?

शॉर्ट वीडियो प्लेटफॉर्म का डिजाइन ही लगातार कंटेंट देने वाला होता है। यूजर को हर कुछ सेकंड में नया वीडियो मिलता है और एल्गोरिदम अक्सर उसकी पसंद के अनुसार कंटेंट दिखाता रहता है।

पहले के शोध में भी व्यक्तिगत रूप से सुझाए गए वीडियो देखने के दौरान दिमाग के रिवॉर्ड और नेटवर्क सिस्टम में बदलाव देखे गए थे। इससे यह समझने में मदद मिलती है कि व्यक्तिगत पसंद के अनुसार लगातार मिलने वाला कंटेंट लोगों को लंबे समय तक प्लेटफॉर्म पर बनाए रखने में क्यों प्रभावी हो सकता है।

रील्स देखना पूरी तरह बंद करना जरूरी है?

नहीं। इस अध्ययन का निष्कर्ष यह नहीं है कि हर व्यक्ति को तुरंत रील्स और शॉर्ट वीडियो देखना बंद कर देना चाहिए। मुख्य बात समय और नियंत्रण की है।

अगर शॉर्ट वीडियो मनोरंजन के सीमित साधन के रूप में देखे जा रहे हैं और वे नींद, पढ़ाई, काम या रोजमर्रा की जिम्मेदारियों को प्रभावित नहीं कर रहे, तो स्थिति अलग हो सकती है। समस्या तब बढ़ सकती है जब स्क्रॉलिंग आदत नियंत्रण से बाहर होने लगे।

रील्स स्क्रॉलिंग कम करने के आसान तरीके

1. समय की सीमा तय करें

दिन में रील्स देखने के लिए एक निश्चित समय तय करें।

2. सोने से पहले स्क्रॉलिंग से बचें

बिस्तर पर जाते ही लगातार वीडियो देखने की आदत नींद का समय कम कर सकती है।

3. ऑटोमैटिक नोटिफिकेशन बंद करें

बार-बार आने वाले नोटिफिकेशन आपको दोबारा ऐप खोलने के लिए प्रेरित कर सकते हैं।

4. पढ़ाई या काम के दौरान फोन दूर रखें

फोन आंखों के सामने होने पर ध्यान भटकने की संभावना बढ़ सकती है।

5. “एक और वीडियो” वाली आदत को पहचानें

जब आपको महसूस हो कि आप बिना किसी खास उद्देश्य के लगातार स्क्रॉल कर रहे हैं, तो कुछ मिनट का ब्रेक लें।

निष्कर्ष

चीन की झेजियांग यूनिवर्सिटी से जुड़े वैज्ञानिकों की नई NeuroImage स्टडी ने शॉर्ट वीडियो देखने के दौरान दिमाग के कॉग्निटिव कंट्रोल नेटवर्क में होने वाले बदलावों को लेकर महत्वपूर्ण जानकारी दी है। अध्ययन में पसंदीदा शॉर्ट वीडियो देखने के दौरान dACC और dlPFC जैसे क्षेत्रों की गतिविधि में कमी देखी गई और ग्लूटामेट जैसे न्यूरोकेमिकल कारकों की संभावित भूमिका भी सामने आई।

हालांकि, इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि कभी-कभार रील्स देखना नुकसानदायक है। वैज्ञानिक दृष्टि से अधिक महत्वपूर्ण सवाल यह है कि व्यक्ति कितना समय स्क्रॉल कर रहा है और क्या उसका उपयोग उसके ध्यान, नींद, काम और रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित कर रहा है।

 

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