Meghalaya Wedding Tradition-शादी के बाद दुल्हन नहीं जाती ससुराल, दूल्हे की होती है विदाई, जानिए- इस राज्य की अनोखी परंपरा???

मेघालय के खासी समाज में मातृवंशीय परंपरा के कारण शादी के बाद दूल्हे के पत्नी के घर जाने की परंपरा चर्चा में रहती है...

आमतौर पर भारतीय शादियों में सबसे भावुक पल दुल्हन की विदाई को माना जाता है। शादी के बाद बेटी अपने मायके को छोड़कर पति के घर यानी ससुराल चली जाती है। लेकिन भारत की सांस्कृतिक विविधता इतनी बड़ी है कि यहां इसका बिल्कुल उल्टा चलन भी देखने को मिलता है। मेघालय में रहने वाले कुछ समुदायों, खासकर खासी समाज में, शादी के बाद दुल्हन की बजाय दूल्हे के पत्नी के घर जाने की परंपरा देखने को मिलती है।

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मेघालय में क्यों होती है दूल्हे की विदाई?

मेघालय की यह परंपरा वहां की मातृवंशीय (Matrilineal) सामाजिक व्यवस्था से जुड़ी है। सरकारी जानकारी के अनुसार खासी, जैंतिया और गारो समुदायों में वंश परंपरा मां की ओर से चलती है। यानी परिवार की पहचान और वंश का संबंध मां से जोड़ा जाता है।

खासी समाज में तो इस व्यवस्था की जड़ें काफी गहरी हैं। मेघालय सरकार के अनुसार खासी समुदाय में वंश मां के माध्यम से चलता है और पैतृक संपत्ति की उत्तराधिकारी आमतौर पर सबसे छोटी बेटी ‘का खद्दुह’ (Ka Khadduh) होती है।

इसी सामाजिक व्यवस्था का असर विवाह के बाद रहने की परंपराओं पर भी दिखाई देता है। कई मामलों में शादी के बाद पति पत्नी के परिवार के साथ रहने लगता है। इसलिए यहां शादी के बाद होने वाली विदाई में दुल्हन की जगह दूल्हे को पत्नी के घर जाते हुए देखा जाता है।

यहां महिलाओं के हाथ में रहती है परिवार की विरासत

खासी समाज की सबसे खास बात इसकी मातृवंशीय व्यवस्था है। सामान्य भारतीय पितृवंशीय व्यवस्था में परिवार का वंश और संपत्ति अक्सर पिता की ओर से आगे बढ़ती है, लेकिन खासी समाज में वंश मां की ओर से चलता है।

मेघालय सरकार के मुताबिक खासी समाज में सबसे छोटी बेटी को पारंपरिक पैतृक संपत्ति की उत्तराधिकारी माना जाता है। उसे ‘का खद्दुह’ कहा जाता है। अगर सबसे छोटी बेटी की कोई बेटी नहीं होती, तो कुछ परिस्थितियों में उत्तराधिकार अगली बहन और उसकी बेटी की ओर जा सकता है।

यही कारण है कि बेटी का अपने मायके में रहना और परिवार की जिम्मेदारियां संभालना इस सामाजिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

शादी के बाद पति बन जाता है पत्नी के परिवार का सदस्य

इस परंपरा को केवल ‘दूल्हे की विदाई’ कहकर समझना अधूरा होगा। असल में यह पूरे सामाजिक ढांचे से जुड़ी व्यवस्था है।

शादी के बाद पति अपनी पत्नी के परिवार के साथ रह सकता है और परिवार के सदस्य के रूप में अपनी जिम्मेदारियां निभाता है। कुछ लोकप्रिय रिपोर्टों में इसे ‘घर जमाई’ जैसी व्यवस्था के तौर पर बताया गया है, लेकिन खासी समाज की अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक व्यवस्था है, इसलिए इसे सामान्य भारतीय ‘घर जमाई’ की अवधारणा से पूरी तरह समान मानना सही नहीं होगा।

बेटी नहीं छोड़ती अपना मायका

इस व्यवस्था का सबसे बड़ा अंतर यही है कि पारंपरिक पितृवंशीय समाजों की तरह बेटी का शादी के बाद हमेशा के लिए अपना मायका छोड़ना जरूरी नहीं माना जाता।

खासी समाज में परिवार की वंश परंपरा मां से चलती है। यही वजह है कि बेटी अपने परिवार और घर से जुड़ी रहती है। मेघालय सरकार के अनुसार खासी समाज में घर और परिवार की व्यवस्था में महिला की महत्वपूर्ण भूमिका होती है, जबकि पुरुष भी परिवार की आर्थिक और सामाजिक जिम्मेदारियों में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।

इसलिए इसे सिर्फ ‘महिलाओं का राज’ कहना पूरी तस्वीर नहीं बताता। मातृवंशीय व्यवस्था का अर्थ यह है कि वंश और उत्तराधिकार की परंपरा मुख्य रूप से महिला पक्ष से चलती है, जबकि परिवार में पुरुषों की भी महत्वपूर्ण भूमिका रहती है।

क्या पूरे मेघालय में यही नियम है?

नहीं। यह समझना जरूरी है कि मेघालय के हर परिवार में शादी के बाद दूल्हे की विदाई होती है, ऐसा कहना सही नहीं होगा।

मेघालय में खासी, जैंतिया और गारो जैसे अलग-अलग समुदाय रहते हैं और उनके रीति-रिवाजों में भी अंतर हो सकता है। राज्य सरकार भी इन समुदायों को मातृवंशीय समाजों के रूप में वर्णित करती है।

खासी समाज के अलग-अलग इलाकों में भी आधुनिक शिक्षा, रोजगार, धर्म और बदलती जीवनशैली के कारण पारंपरिक रीति-रिवाजों में बदलाव देखने को मिल रहा है। फिर भी मातृवंशीय वंश और उत्तराधिकार की परंपरा आज भी खासी संस्कृति की प्रमुख पहचान है।

सबसे छोटी बेटी को क्यों मिलती है खास जिम्मेदारी?

खासी समाज में सबसे छोटी बेटी को का खद्दुह कहा जाता है और पारंपरिक व्यवस्था में उसे पैतृक संपत्ति का उत्तराधिकारी माना जाता है। इसका एक महत्वपूर्ण कारण परिवार और बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल से जुड़ा है।

परंपरागत रूप से सबसे छोटी बेटी से उम्मीद की जाती है कि वह परिवार के घर से जुड़ी रहे और माता-पिता की देखभाल करे। इसलिए शादी के बाद भी बेटी का अपने परिवार से रिश्ता कमजोर नहीं होता।

पुरुषों की भूमिका भी होती है महत्वपूर्ण

यह कहना गलत होगा कि इस समाज में पुरुषों की कोई भूमिका नहीं होती। मेघालय सरकार की जानकारी के अनुसार खासी परिवार में पुरुष परिवार के आर्थिक और सामाजिक जीवन में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।

यानी यहां व्यवस्था पुरुष बनाम महिला की लड़ाई पर आधारित नहीं है, बल्कि वंश, संपत्ति और परिवार की जिम्मेदारियों के अलग तरीके से बंटवारे पर आधारित है।

भारत की विविध संस्कृति का अनोखा उदाहरण

भारत में विवाह से जुड़े रीति-रिवाज क्षेत्र, समुदाय और सामाजिक व्यवस्था के अनुसार काफी बदल जाते हैं। कहीं दुल्हन की विदाई प्रमुख रस्म होती है तो कहीं विवाह के बाद पति पत्नी के परिवार के साथ रहने लगता है।

मेघालय की खासी परंपरा इस विविधता का एक शानदार उदाहरण है। यहां विवाह के बाद दूल्हे का पत्नी के घर जाना सिर्फ एक रस्म नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही मातृवंशीय सामाजिक व्यवस्था से जुड़ा हुआ है।

इसलिए अगली बार जब आप सुनें कि ‘इस जगह शादी के बाद दुल्हन नहीं, दूल्हे की विदाई होती है’, तो इसे केवल एक अजीब शादी की रस्म न समझें। इसके पीछे परिवार, संपत्ति, वंश और सामाजिक जिम्मेदारियों की एक अलग व्यवस्था काम करती है।

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