Price Monitoring System- दिवाली से पहले बाजार की दिशा अब मुख्य रूप से नई फसल की उम्मीद ????
चना, अरहर, मटर… हर दाल हुई महंगी; दिवाली से पहले क्यों भागे दलहन के दाम....
नई दिल्ली: दिवाली से पहले देश में दालों की कीमतों को लेकर उपभोक्ताओं की चिंता बढ़ गई है। सितंबर के दौरान चना, अरहर/तूर, मूंग और मटर समेत कई प्रमुख दलहनों के थोक भाव में तेजी दर्ज की गई है। उपलब्ध बाजार आंकड़ों के अनुसार, पिछले एक महीने में प्रमुख दलहनों के थोक भाव में करीब 6 से 11 फीसदी तक बढ़ोतरी हुई है। इसके पीछे त्योहारों से बढ़ी मांग के साथ फसल उत्पादन को लेकर चिंता, बारिश की कमी और अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति जैसे कई कारण बताए जा रहे हैं।
एक महीने में कितने बढ़े दाम?
इंडियन पल्सेस एंड ग्रेन्स एसोसिएशन (IPGA) के आंकड़ों के अनुसार, सितंबर में चने के थोक भाव में करीब 11 फीसदी, मूंग में लगभग 10.6 फीसदी, तूर में करीब 6.5 फीसदी और मटर में लगभग 6 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। पिछले सप्ताह में भी कुछ दलहनों के भाव में 3 से 5 फीसदी तक तेजी दर्ज की गई।
सरकार के Price Monitoring System के 28 सितंबर 2026 के आंकड़ों के मुताबिक, देश में औसत खुदरा कीमतें लगभग ₹88.72 प्रति किलो ग्राम दाल, ₹125.72 प्रति किलो तूर/अरहर दाल, ₹112.14 प्रति किलो मूंग दाल और ₹90.43 प्रति किलो मसूर दाल थीं। अलग-अलग राज्यों, शहरों, गुणवत्ता और ब्रांड के अनुसार वास्तविक खुदरा कीमतें अलग हो सकती हैं।
दिवाली से पहले क्यों बढ़ रही है दालों की कीमत?
दालों की कीमत में मौजूदा तेजी को केवल दिवाली की मांग से जोड़ना सही नहीं होगा। बाजार में कई कारक एक साथ काम कर रहे हैं।
1. त्योहारों की मांग बढ़ी
दिवाली और उससे जुड़े त्योहारों के दौरान घरों में खरीदारी बढ़ती है। बेसन, चना दाल, अरहर, मूंग और अन्य दालों की मांग भी बढ़ सकती है। कारोबारियों के मुताबिक, इस अतिरिक्त मांग ने बाजार में कीमतों पर दबाव बढ़ाया है।
2. बारिश की कमी से फसल पर चिंता
दलहन की कीमतों पर मौसम का सीधा असर पड़ता है। महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों में बारिश और मिट्टी की नमी को लेकर चिंता ने आगामी उत्पादन के अनुमान पर असर डाला है। खासकर तूर की खरीफ फसल और चने की आगामी रबी फसल को लेकर बाजार में सतर्कता बढ़ी है।
3. चने पर रबी सीजन का दबाव
चना मुख्य रूप से रबी फसल है। इसलिए आने वाले रबी सीजन की बुवाई और मौसम की परिस्थितियां इसके भाव को प्रभावित कर सकती हैं। बाजार में भविष्य की उपलब्धता को लेकर आशंकाएं बढ़ने पर व्यापारी और स्टॉकिस्ट कीमतों को लेकर ज्यादा सतर्क हो जाते हैं।
4. मटर की कीमतों पर अंतरराष्ट्रीय असर
मटर के मामले में अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थिति भी महत्वपूर्ण है। भारत अपनी घरेलू जरूरतों के एक हिस्से के लिए आयात पर निर्भर रहता है। रूस सहित कुछ प्रमुख आपूर्तिकर्ता देशों से उपलब्धता और वैश्विक कीमतों में बदलाव का असर भारतीय बाजार पर पड़ सकता है।
5. आयात और घरेलू उपलब्धता
भारत में दालों की मांग काफी बड़ी है और घरेलू उत्पादन के बावजूद कुछ मात्रा का आयात किया जाता है। इसलिए घरेलू उत्पादन की उम्मीद, विदेशी बाजार के भाव और आयात की उपलब्धता मिलकर कीमतों को प्रभावित करते हैं।
हालांकि, मौजूदा तेजी को तत्काल देशव्यापी दाल संकट या पूर्ण कमी के रूप में देखना जरूरी नहीं है। सरकार के अनुमान के अनुसार 2025-26 में भारत का कुल दलहन उत्पादन 274.09 लाख टन रहने का अनुमान था, जो 2023-24 के 242.46 लाख टन से अधिक है।
क्या सरकार के बफर स्टॉक से मिलेगी राहत?
दालों की कीमतों में अचानक तेजी आने पर सरकार के पास बफर स्टॉक के जरिए बाजार में हस्तक्षेप करने का विकल्प रहता है। उपभोक्ता मामलों के विभाग के अनुसार, सरकार दलहन का रणनीतिक बफर स्टॉक रखती है और जरूरत के मुताबिक इसकी नियंत्रित मात्रा बाजार में जारी की जा सकती है। इसका उद्देश्य जमाखोरी और सट्टेबाजी पर अंकुश लगाने के साथ उपभोक्ताओं को उचित कीमत पर आपूर्ति उपलब्ध कराना है।
हालिया रिपोर्ट के अनुसार सरकार के पास दलहन का बफर स्टॉक करीब 45 लाख टन तक पहुंच गया है, जो निर्धारित 35 लाख टन के बफर मानक से अधिक है। इसमें चना, तूर, मूंग और मसूर जैसी प्रमुख दालें शामिल हैं।
इसलिए अगर बाजार में कीमतों का दबाव आगे भी बढ़ता है, तो बफर स्टॉक से नियंत्रित रिलीज कीमतों को शांत करने का एक महत्वपूर्ण साधन हो सकता है। हालांकि, कीमतों में वास्तविक राहत कितनी और कितनी जल्दी मिलेगी, यह रिलीज की मात्रा, समय और बाजार में आपूर्ति की स्थिति पर निर्भर करेगा।
क्या दिवाली तक दाल और महंगी हो सकती है?
आने वाले दिनों में दालों के भाव पर कई चीजों का असर पड़ेगा। इनमें दिवाली की मांग, नई फसल की आवक, खरीफ उत्पादन के आंकड़े, रबी बुवाई की स्थिति, बारिश और मिट्टी की नमी तथा आयात की उपलब्धता प्रमुख हैं।
यदि बाजार में नई फसल की आवक अच्छी रहती है और सरकार जरूरत के मुताबिक बफर स्टॉक जारी करती है, तो कीमतों पर दबाव कम हो सकता है। दूसरी ओर, यदि मौसम संबंधी चिंताएं बनी रहती हैं और मांग मजबूत रहती है, तो कुछ दलहनों के भाव ऊंचे बने रह सकते हैं।
आम लोगों की जेब पर क्या असर?
दाल भारतीय घरों के रोजमर्रा के भोजन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसलिए थोक बाजार में लगातार तेजी रहने पर इसका असर धीरे-धीरे खुदरा बाजार में भी दिखाई दे सकता है। हालांकि थोक कीमत में हुई हर बढ़ोतरी उसी अनुपात में खुदरा कीमत तक पहुंचे, यह जरूरी नहीं है।
शहर, मंडी, दाल की गुणवत्ता, ब्रांड, पैकेजिंग और स्थानीय आपूर्ति के आधार पर उपभोक्ताओं को अलग-अलग कीमत चुकानी पड़ सकती है। सरकार भी Price Monitoring System के जरिए प्रमुख खाद्य वस्तुओं के दैनिक दामों पर नजर रखती है।
फिलहाल क्या समझें?
दालों की मौजूदा तेजी के पीछे त्योहारी मांग, मौसम और फसल को लेकर चिंता तथा वैश्विक आपूर्ति जैसे कई कारण हैं। आंकड़ों में कुछ प्रमुख दलहनों के थोक भाव में पिछले महीने उल्लेखनीय वृद्धि दिखाई देती है, लेकिन इसे तत्काल देशव्यापी दाल की कमी कहना उचित नहीं होगा।
दिवाली से पहले बाजार की दिशा अब मुख्य रूप से नई फसल की उम्मीद, मंडियों में आवक और सरकार के संभावित बफर स्टॉक हस्तक्षेप पर निर्भर करेगी। यदि सरकार बाजार में पर्याप्त मात्रा में स्टॉक उतारती है और नई फसल की आवक बेहतर रहती है, तो उपभोक्ताओं को कुछ राहत मिल सकती है।






