श्रावस्ती: मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह योजना से गरीब जोड़े का नाम कटा, रिश्वत न देने का आरोप; डीएम कार्यालय पहुंचा परिवार
श्रावस्ती में सामूहिक विवाह योजना से नाम कटा, रिश्वत मांगने का आरोप
श्रावस्ती में मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह योजना से गरीब जोड़े का नाम कटने पर परिवार ने ग्राम विकास अधिकारी पर रिश्वत मांगने का आरोप लगाकर डीएम से कार्रवाई की मांग की।
श्रावस्ती। उत्तर प्रदेश सरकार की महत्वाकांक्षी मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह योजना को लेकर श्रावस्ती जिले में एक गंभीर मामला सामने आया है। एक गरीब परिवार ने आरोप लगाया है कि रिश्वत की मांग पूरी न करने पर उनके बेटे-बेटी (नवविवाहित जोड़े) का नाम योजना की लाभार्थी सूची से हटा दिया गया। न्याय की उम्मीद लेकर पीड़ित परिवार सोमवार को जिलाधिकारी कार्यालय पहुंचा और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की।
पीड़ित जगत राम ने आरोप लगाया कि योजना में नाम बनाए रखने के लिए संबंधित ग्राम विकास अधिकारी (वीडीओ) द्वारा 2,000 रुपये की रिश्वत मांगी गई। परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण वे केवल 500 रुपये ही दे सके। आरोप है कि शेष राशि नहीं देने पर उनके बेटे-बेटी का नाम लाभार्थियों की सूची से हटा दिया गया।
परिवार का कहना है कि 30 जुलाई को आयोजित मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह कार्यक्रम में उनके जोड़े का विवाह होना था। लेकिन कार्यक्रम से ठीक पहले सूची से नाम हट जाने के कारण परिवार मानसिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से परेशान हो गया। गरीब परिवार ने इसे प्रशासनिक लापरवाही और भ्रष्टाचार का मामला बताते हुए जिलाधिकारी से हस्तक्षेप की मांग की है।
पीड़ित परिवार ने जिलाधिकारी को दिए गए प्रार्थना पत्र में मांग की है कि उनके जोड़े को पुनः मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह योजना में शामिल किया जाए, पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए और यदि रिश्वत मांगने के आरोप सही पाए जाते हैं तो संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की जाए।
इस घटना ने सरकारी योजनाओं की पारदर्शिता और पात्र लाभार्थियों तक योजनाओं का लाभ पहुंचाने की व्यवस्था पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। अब सभी की नजर जिला प्रशासन की कार्रवाई पर टिकी है। यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं तो संबंधित अधिकारियों पर विभागीय कार्रवाई के साथ अन्य कानूनी कदम भी उठाए जा सकते हैं।
फिलहाल जिला प्रशासन की ओर से इस मामले में कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया गया है। प्रशासनिक जांच के बाद ही पूरे मामले की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।





