Monsoon Rain Update:-मानसून की विदाई में भी आफत! उफनती नदियां और दरकते पहाड़, जानें कहां भारी बारिश ???
उफनती नदियां, दरकते पहाड़, चेरापूंजी से ज्यादा बारिश… जानें मानसून से कहां राहत और कहां आफत...
नई दिल्ली: देश में दक्षिण-पश्चिम मानसून अब धीरे-धीरे वापसी की ओर बढ़ रहा है, लेकिन मानसून की विदाई से पहले कई इलाकों में बारिश ने मुश्किलें बढ़ा दी हैं। पहाड़ी राज्यों में लगातार बारिश के कारण भूस्खलन, चट्टानें खिसकने और नदियों-नालों के जलस्तर बढ़ने का खतरा बना हुआ है। वहीं मैदानी इलाकों में कई जगह बाढ़ और जलभराव ने लोगों की परेशानी बढ़ाई है।
दिलचस्प बात यह है कि पूरे देश की तस्वीर एक जैसी नहीं है। सितंबर में भारत के औसत स्तर पर बारिश कमजोर रहने की आशंका जताई गई है, लेकिन इसके बावजूद कुछ इलाकों में कम समय में बेहद तेज बारिश हो रही है। यही वजह है कि एक तरफ किसान बारिश का इंतजार कर रहे हैं तो दूसरी तरफ कुछ राज्यों में यही बारिश आपदा का रूप ले रही है।
मानसून की विदाई के बीच क्यों हो रही है इतनी बारिश?
मानसून का पीछे हटना यह नहीं बताता कि देश के हर हिस्से से बारिश अचानक बंद हो जाएगी। स्थानीय मौसम प्रणालियां, निम्न दबाव क्षेत्र, नमी वाली हवाएं और पहाड़ी इलाकों की भौगोलिक परिस्थितियां कई जगह तेज बारिश करा सकती हैं।
IMD के हालिया पूर्वानुमान में उत्तराखंड समेत कई क्षेत्रों में बारिश और गरज-चमक की गतिविधियां जारी रहने की संभावना जताई गई है। 10 से 12 सितंबर के बीच उत्तराखंड के कुछ हिस्सों में भारी बारिश के साथ संवेदनशील पहाड़ी इलाकों में भूस्खलन, चट्टान गिरने, सड़क बाधित होने और नदियों-नालों के उफान का खतरा बताया गया है।
यानी मानसून भले ही अपने अंतिम चरण में पहुंच गया हो, लेकिन ‘जाते-जाते बारिश का जोर’ कई इलाकों में देखने को मिल सकता है।
उत्तराखंड में सबसे ज्यादा खतरा, दरक रहे पहाड़
उत्तराखंड इस समय मानसूनी बारिश के सबसे संवेदनशील इलाकों में शामिल है। पहाड़ी क्षेत्रों में लगातार बारिश के कारण मिट्टी कमजोर हो रही है और ढलानों पर भूस्खलन का खतरा बढ़ रहा है।
सितंबर की शुरुआत में भारी बारिश के कारण राज्य में कई जगह सड़कें बंद हुईं और नदियों का जलस्तर बढ़ा। एक रिपोर्ट के मुताबिक राज्य में भूस्खलन और बोल्डर गिरने से 136 सड़कें बंद हुई थीं।
उधर उत्तरकाशी के एक गांव में बारिश के बीच बड़े पैमाने पर भूस्खलन हुआ, जिससे चट्टान और मलबा घरों तक पहुंच गया। लोगों को सुरक्षित स्थानों पर जाना पड़ा और कई घरों को नुकसान पहुंचा।
पहाड़ों में बारिश ज्यादा खतरनाक क्यों?
पहाड़ी क्षेत्रों में बारिश का पानी तेजी से नीचे की ओर बहता है। यदि थोड़े समय में बड़ी मात्रा में पानी गिर जाए तो छोटी धाराएं और नाले अचानक उफन सकते हैं। इसके साथ ही लगातार बारिश मिट्टी और चट्टानों को कमजोर कर देती है।
इसका परिणाम तीन तरह से सामने आता है—
- अचानक फ्लैश फ्लड
- भूस्खलन और बोल्डर गिरना
- सड़क और पुलों का क्षतिग्रस्त होना
इसीलिए IMD और स्थानीय प्रशासन संवेदनशील पहाड़ी क्षेत्रों में लोगों को विशेष सावधानी बरतने की सलाह दे रहे हैं।
उत्तर प्रदेश में भी नदियों का जलस्तर बढ़ा
उत्तर प्रदेश में भी बारिश और ऊपर से आने वाले पानी का असर दिखाई दे रहा है। राज्य के कई हिस्सों में नदियों का जलस्तर बढ़ा है और बाढ़ जैसी स्थिति बनी है।
हालिया रिपोर्टों के अनुसार राज्य के 26 जिलों में करीब 3.53 लाख लोग प्रभावित हुए हैं। कई इलाकों में गंगा और घाघरा जैसी नदियों के जलस्तर ने लोगों की चिंता बढ़ाई है। वाराणसी में गंगा का जलस्तर चेतावनी स्तर से ऊपर दर्ज किया गया और कई घाट प्रभावित हुए।
इसका असर खास तौर पर नदी किनारे बसे गांवों, खेती और निचले इलाकों पर पड़ा है। प्रशासन की ओर से राहत शिविर और लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने की कार्रवाई भी की गई है।
चेरापूंजी और पूर्वोत्तर में बारिश का अलग मिजाज
मेघालय का चेरापूंजी दुनिया के सबसे अधिक बारिश वाले इलाकों में जाना जाता है। यहां बारिश का आंकड़ा अक्सर सामान्य भारतीय शहरों की तुलना में कई गुना ज्यादा होता है।
हालांकि मौजूदा मौसम की स्थिति को देखते हुए किसी एक दिन की रिकॉर्ड बारिश को पूरे मानसून की तस्वीर मानना सही नहीं होगा। पूर्वोत्तर में स्थानीय मौसम प्रणालियों के कारण कुछ इलाकों में अचानक बहुत तेज बारिश हो सकती है।
IMD ने हालिया पूर्वानुमानों में Sub-Himalayan West Bengal और Sikkim के साथ कुछ पूर्वी और पूर्वोत्तर क्षेत्रों में व्यापक बारिश की संभावना जताई है।
पश्चिम बंगाल और सिक्किम में भी बारिश का असर
पूर्वी भारत में भी मानसून की सक्रियता देखने को मिल रही है। पश्चिम बंगाल के कई इलाकों में भारी बारिश दर्ज की गई है। कोलकाता में हालिया बारिश के दौरान करीब 78.2 मिमी बारिश दर्ज की गई थी और दक्षिण बंगाल के कई जिलों के लिए अलर्ट जारी किया गया था। उत्तर बंगाल के दार्जिलिंग, कलिम्पोंग, कूचबिहार, अलीपुरद्वार और जलपाईगुड़ी जैसे क्षेत्रों में भी भारी से बहुत भारी बारिश की संभावना बताई गई थी।
सिक्किम में भी भूस्खलन के कारण नदियों के प्रवाह और सड़क संपर्क पर असर पड़ने की घटनाएं सामने आई हैं।
मध्य भारत में भी बारिश ने दिखाया असर
मानसून की सक्रियता केवल हिमालयी राज्यों तक सीमित नहीं रही। IMD ने सितंबर की शुरुआत में मध्य प्रदेश में निम्न दबाव क्षेत्र के प्रभाव से भारी से बहुत भारी बारिश की संभावना जताई थी। पूर्वी मध्य प्रदेश में कुछ स्थानों पर अत्यधिक भारी बारिश की आशंका भी बताई गई थी।
वहीं राजस्थान और पश्चिमी मध्य प्रदेश में भी कुछ इलाकों में भारी बारिश की संभावना जताई गई थी।
इससे निचले इलाकों में जलभराव के साथ खेतों में खड़ी फसलों पर भी असर पड़ सकता है।
एक तरफ बाढ़, दूसरी तरफ बारिश की कमी
इस मानसून की सबसे बड़ी खासियत इसका असमान वितरण है। देश के कुछ हिस्सों में बारिश की एक-दो घटनाएं बाढ़ और भूस्खलन जैसी स्थिति पैदा कर रही हैं, जबकि दूसरे क्षेत्रों में बारिश सामान्य से कम है।
रॉयटर्स की 4 सितंबर की रिपोर्ट के अनुसार सितंबर 2026 में भारत में बारिश सामान्य से कम रहने की स्थिति बनी हुई है। कमजोर बारिश का असर खरीफ फसलों और आगे रबी की बुवाई के लिए मिट्टी की नमी पर पड़ सकता है।
यानी मौसम की चुनौती सिर्फ ‘ज्यादा बारिश’ नहीं है। चुनौती यह भी है कि बारिश कहां, कब और कितनी देर में हो रही है।
क्या मानसून की विदाई के बाद भी बारिश होगी?
हां। मानसून की वापसी का मतलब यह नहीं है कि पूरे देश में बारिश खत्म हो जाएगी।
मानसून की वापसी धीरे-धीरे होती है और इस दौरान कई राज्यों में स्थानीय मौसम प्रणालियां बारिश करा सकती हैं। इसके अलावा बंगाल की खाड़ी में बनने वाले निम्न दबाव क्षेत्र पूर्वी और मध्य भारत में बारिश को प्रभावित कर सकते हैं।
IMD के हालिया पूर्वानुमान में भी कई राज्यों में सितंबर के दूसरे सप्ताह तक बारिश की गतिविधियां जारी रहने की संभावना बताई गई है।
इसलिए पहाड़ी क्षेत्रों, नदी किनारे रहने वाले लोगों और पहले से जलभराव वाले इलाकों में मानसून की विदाई तक सावधानी बरतना जरूरी है।
किसानों के लिए कैसी है तस्वीर?
किसानों के लिए यह स्थिति दोधारी तलवार जैसी है। जहां पर्याप्त बारिश से खेतों में नमी और जल उपलब्धता बेहतर हो सकती है, वहीं अत्यधिक बारिश खेतों में पानी भरने, फसल गिरने और मिट्टी के कटाव की समस्या पैदा कर सकती है।
दूसरी ओर, सितंबर में बारिश की कमी होने पर खरीफ फसलों की अंतिम बढ़वार प्रभावित हो सकती है। साथ ही मिट्टी में पर्याप्त नमी नहीं रहने पर रबी की बुवाई के लिए भी चुनौती पैदा हो सकती है।
इसलिए मौसम विभाग के स्थानीय और जिला स्तर के पूर्वानुमान किसानों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं।
लोगों को क्या सावधानी बरतनी चाहिए?
बारिश और भूस्खलन वाले क्षेत्रों में प्रशासन की चेतावनी को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। खासकर पहाड़ी क्षेत्रों में—
- नदी और नालों के किनारे जाने से बचें।
- भूस्खलन संभावित ढलानों से दूरी रखें।
- बारिश के दौरान अनावश्यक पहाड़ी यात्रा न करें।
- सड़क पर मलबा या पत्थर दिखे तो आगे बढ़ने का जोखिम न लें।
- बिजली चमकने के दौरान खुले मैदान में न रहें।
- स्थानीय प्रशासन और IMD के अलर्ट पर नजर रखें।
भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के अनुसार भूस्खलन वाले स्थानों पर दोबारा मलबा खिसकने का खतरा रह सकता है, इसलिए प्रभावित ढलानों और नदियों से दूरी रखना जरूरी है।
निष्कर्ष: मानसून विदा हो रहा है, लेकिन खतरा पूरी तरह टला नहीं
दक्षिण-पश्चिम मानसून अपने अंतिम चरण में है, लेकिन देश के कई हिस्सों में इसके तेवर अभी भी दिखाई दे रहे हैं। उत्तराखंड में भूस्खलन और फ्लैश फ्लड का खतरा, उत्तर प्रदेश में बढ़ता नदी जलस्तर, पूर्वोत्तर और पूर्वी भारत में भारी बारिश और मध्य भारत में स्थानीय मौसम प्रणालियां बताती हैं कि मानसून की विदाई चरणबद्ध और असमान रहने वाली है।
ऐसे में अगले कुछ दिनों तक लोगों को यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि मानसून खत्म हो गया है। खासकर पहाड़ी और नदी किनारे वाले क्षेत्रों में स्थानीय मौसम चेतावनी ही सबसे महत्वपूर्ण संकेत होगी। IMD के मौजूदा पूर्वानुमान भी कई इलाकों में बारिश जारी रहने की ओर इशारा कर रहे हैं।





